मलाईदार पदों पर बाहरी नेताओं की ठेकेदारी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की उपेक्षा ने डुबोई भाजपा की लुटिया; सांगठनिक पन्नों को खोलती एक खोजी रिपोर्ट
वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लिए अब तक की सबसे शर्मनाक और सांगठनिक रीढ़ तोड़ने वाली खबर सामने आई है। वाराणसी खंड स्नातक और शिक्षक विधान परिषद (MLC) दोनों ही सीटों पर सत्ताधारी दल का अहंकार ताश के पत्तों की तरह ढह गया है। वाराणसी स्नातक MLC सीट पर समाजवादी पार्टी (SP) के प्रत्याशी आशुतोष सिन्हा ने लगातार दूसरी बार ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए भाजपा के निवर्तमान प्रत्याशी केदारनाथ सिंह को 19,932 वोटों के भारी अंतर से धूल चटा दी है। आशुतोष सिन्हा को कुल 55,046 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी केदारनाथ सिंह महज 35,114 वोटों पर सिमट कर रह गए।
मजे की बात यह है कि भाजपा को सिर्फ स्नातक में ही नहीं, बल्कि वाराणसी खंड शिक्षक MLC सीट पर भी करारा तमाचा लगा है। भाजपा ने इस बार बड़े दावों के साथ डॉ. प्रमोद मिश्रा को अपना अधिकृत टिकट देकर मैदान में उतारा था, लेकिन उन्हें सपा के निवर्तमान एमएलसी लाल बिहारी यादव के हाथों 5,015 वोटों के बड़े अंतर से बेहद शर्मनाक और करारी हार का सामना करना पड़ा है। लाल बिहारी यादव (कुल 11,612 मत) ने भाजपा के डॉ. प्रमोद मिश्रा (कुल 6,597 मत) को शिकस्त देकर साबित कर दिया है कि भाजपा का जमीनी किला पूरी तरह ढह चुका है।
वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने बयां किया दर्द: पिछली हार से सबक न लेना पड़ा भारी, प्रत्याशी अपने दम पर कहाँ तक लड़ता?
इस ऐतिहासिक पराजय के बाद भाजपा के भीतर का ज्वालामुखी अब सरेआम फट चुका है। नाम न छापने की शर्त पर कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं और पदाधिकारियों ने जमीनी कार्यकर्ताओं के गहरे दुख और आक्रोश को साझा करते हुए कहा कि नेतृत्व ने पिछली बार की हार से रत्ती भर भी सबक नहीं लिया।
अंदरूनी सूत्रों ने बताया, "साल 2020 के एमएलसी चुनाव में जब पार्टी हारी थी, तभी खतरे की घंटी बज चुकी थी। उस समय डॉ. प्रमोद मिश्रा निर्दलीय (शर्मा गुट) प्रत्याशी के तौर पर लड़े थे और उन्हें तब 6,830 vote मिले थे। इस बार भाजपा ने उन्हें अपना अधिकृत उम्मीदवार बनाया ताकि जीत पक्की हो सके, लेकिन सांगठनिक निष्क्रियता के कारण उनकी झोली में प्रथम वरीयता में मात्र 6,060 वोट ही आए! यानी भाजपा का सिंबल मिलने के बाद उनकी स्थिति सुधरने के बजाय और खराब हो गई और हार का अंतर पिछली बार के 936 वोटों से बढ़कर इस बार सीधे 5,015 वोट (5 गुना ज्यादा) हो गया! ऐसे माहौल में कोई भी प्रत्याशी केवल अपने दम पर कहाँ तक चुनाव जीत पाएगा?"
मलाईदार पदों पर बैठे बाहरी नेताओं की ठेकेदारी चमकी, करोड़ों के बने मालिक
पार्टी के भीतर सुलग रहे सबसे बड़े खेल का पर्दाफाश करते हुए नेताओं ने कहा कि संगठन के मूल, दरी बिछाने वाले और पुराने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया गया है। बाहर से आए दलबदलू नेताओं को एमएलसी और अन्य मलाईदार सरकारी व सांगठनिक पदों पर धड़ल्ले से मनोनीत किया जा रहा है। आरोप है कि इन पदों पर बैठते ही इन बाहरी आकाओं की 'ठेकेदारी' और सरकारी टेंडरों पर पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि देखते ही देखते ये लोग कई-कई करोड़ रुपयों के मालिक बन बैठे हैं। धनबल, अकूत संपत्ति और सत्ता के मद में डूबे इन नेताओं का संगठन के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं और उनके सुख-दुख से कोई लेना-देना नहीं रह गया है।
'ऊपर कोई सुनने वाला नहीं', इसलिए ग्रेजुएट वोटर लिस्ट से भी बनाई दूरी
स्थानीय नेताओं ने खुलकर स्वीकार किया कि निचले स्तर पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ताओं की सुनने वाला ऊपर कोई आका नहीं बचा है। सत्ता में आने के बाद जिन चुनिंदा चेहरों को मलाईदार कुर्सियां दी गईं, उनकी फॉर्च्यूनर गाड़ियां और आलीशान दफ्तर तो चमक गए, लेकिन दरी बिछाने वाले कार्यकर्ता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। जब संगठन का पुराना कार्यकर्ता ही पूरी तरह हताश और निराश हो गया, तो किसी ने समय रहते नए स्नातक (ग्रेजुएट) मतदाताओं को वोटर लिस्ट में शामिल करने की दिशा में रत्ती भर भी प्रयास नहीं किया। सांगठनिक निष्क्रियता, अपनी ठेकेदारी चमकाने और अंतिम समय में प्रत्याशी घोषित करने के इसी अहंकार ने भाजपा की लुटिया डुबो दी।
यूजीसी और सवर्ण युवाओं की उपेक्षा का फूटा गुस्सा
उत्तर प्रदेश के शैक्षणिक और राजनीतिक परिदृश्य में यूजीसी (UGC) के विवादित फैसलों, उच्च शिक्षा में नियुक्तियों की लेत-देत और लगातार हो रही परीक्षाओं में धांधली व टालमटोल के कारण सवर्ण (श्रावण) व शिक्षित युवा वर्ग में सरकार के खिलाफ गहरा आक्रोश व्याप्त था। वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर और चंदौली के डिग्री कॉलेजों व विश्वविद्यालयों से जुड़े युवा शोधार्थियों, तदर्थ शिक्षकों और बुद्धिजीवियों ने भाजपा की नीतियों से पूरी तरह नाराज होकर इस बार खुलकर अपना गुस्सा बैलेट बॉक्स में निकाला और समाजवादी पार्टी के पक्ष में एकतरफा मतदान कर दिया।
2024 की चेतावनी को किया अनसुना, 2027 में पूरी तरह साफ होने का खतरा
यह चुनाव परिणाम उन स्थानीय क्षत्रपों और बड़बोले नेताओं के गाल पर करारा तमाचा है जो खुद जनता और कार्यकर्ताओं के बीच काम करने के बजाय केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चेहरे के भरोसे अपनी चुनावी नैया पार होने का भ्रम पाले हुए थे। पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव की उस बड़ी चेतावनी से भी कोई सबक नहीं लिया, जहां खुद प्रधानमंत्री मोदी की जीत का अंतर घटकर महज डेढ़ लाख के करीब रह गया था।
अगर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने तत्काल संज्ञान लेकर इस आंतरिक सांगठनिक भ्रष्टाचार, मलाईदार पदों पर बैठे लोगों की मनमानी और पार्टी के माध्यम से सामने आए कार्यकर्ताओं के इस आक्रोश पर तत्काल डैमेज कंट्रोल नहीं किया, तो इसका बेहद भयानक दुष्परिणाम 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है। फिलहाल, प्रधानमंत्री के अपने ही घर में मिली इस करारी शिकस्त को समाजवादी पार्टी अपने लिए 2027 की एक बड़ी 'उम्मीद की किरण' मानकर जश्न मना रही है।