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वाराणसी MLC चुनाव में भाजपा को मिली करारी हार; सपा के आशुतोष सिन्हा ने केदारनाथ सिंह को दी शिकस्त 



 28/Oct/26

"शीर्ष नेतृत्व अहंकार में चूर, आखिरी वक्त पर टिकट वितरण पड़ा भारी" — वरिष्ठ भाजपा नेता का अपनी ही पार्टी पर बड़ा हमला 

वाराणसी: उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) के द्विवार्षिक चुनाव के तहत सबसे हॉट सीट मानी जा रही वाराणसी खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के परिणाम घोषित हो गए हैं। इस बेहद कड़े मुकाबले में समाजवादी पार्टी (सपा) के निवर्तमान एमएलसी आशुतोष सिन्हा ने अपनी सीट बरकरार रखते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और तीन बार के पूर्व एमएलसी केदारनाथ सिंह को करारी शिकस्त दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में मिली इस करारी हार के बाद भाजपा के भीतर आंतरिक घमासान और असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। 

अंतिम समय में टिकट वितरण और नेतृत्व के अहंकार पर उठे सवाल
इस बड़ी चुनावी शिकस्त के बाद भाजपा के ही एक बेहद वरिष्ठ नेता ने पार्टी की चुनावी रणनीति और शीर्ष कमान पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने अपनी संक्षिप्त लेकिन बेहद गंभीर टिप्पणी में कहा, "पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस समय पूरी तरह अहंकार में चूर है। जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हुए अंतिम समय में टिकटों का वितरण किया गया, जिसके कारण कार्यकर्ताओं को जनता और मतदाताओं के बीच जाने का पर्याप्त समय ही नहीं मिला। शीर्ष नेतृत्व की इसी मनमानी और अति-आत्मविश्वास का नतीजा है कि आज भाजपा को अपने सबसे मजबूत गढ़ में इतनी बुरी हार का सामना करना पड़ रहा है।" 

चुनाव परिणाम के सटीक आंकड़े
पहाड़िया मंडी स्थित मतगणना स्थल पर हुई वोटों की गिनती और द्वितीय वरीयता (Preference Votes) के मतों के जोड़ के बाद आधिकारिक आंकड़े इस प्रकार रहे:
• आशुतोष सिन्हा (सपा - विजेता): 26,335 मत
• केदारनाथ सिंह (भाजपा): 22,685 मत
• जीत का अंतर: सपा उम्मीदवार ने केदारनाथ सिंह को 3,650 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। 

हार के पीछे के प्रमुख राजनीतिक कारण और विश्लेषण
राजनीतिक विश्लेषकों और पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, केदारनाथ सिंह के इस बार चुनाव हारने के पीछे मुख्य रूप से निम्नलिखित कारण जिम्मेदार रहे:
• एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर): केदारनाथ सिंह 2004 से इस सीट का मुख्य चेहरा रहे हैं। लंबे समय तक एक ही चेहरे के प्रतिनिधित्व के कारण मतदाताओं के एक बड़े हिस्से, विशेषकर नए और युवा स्नातकों में बदलाव की चाहत थी।
• युवाओं और स्नातकों का मिजाज: स्नातक सीट के मुख्य वोटर शिक्षित युवा और नौकरीपेशा लोग होते हैं। मौजूदा दौर में रोजगार, मानदेय और प्रतियोगी परीक्षाओं के मुद्दों को लेकर युवाओं में उपजा असंतोष भाजपा प्रत्याशी के लिए भारी पड़ गया।
• सपा का आक्रामक वोटर प्रबंधन: समाजवादी पार्टी ने इस क्षेत्र (वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर and चंदौली) में पिछले कुछ सालों में नए और युवा स्नातकों के रिकॉर्ड तोड़ पंजीकरण (वोटर आईडी) करवाए और उन्हें पोलिंग बूथ तक लेकर आए, जिसका सीधा लाभ उनके प्रत्याशी को मिला।
• सपा का दोहरा दबदबा: वाराणसी खंड की दोनों महत्वपूर्ण सीटों पर इस बार समाजवादी पार्टी का परचम लहराया है। स्नातक सीट पर आशुतोष सिन्हा की जीत से ठीक पहले, वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भी सपा उम्मीदवार लाल बिहारी यादव ने भाजपा के डॉ. प्रमोद कुमार मिश्रा को हराकर जीत दर्ज की थी। 

क्या इतिहास दोहराएगी सपा, या फिर पलटेगी बाजी? (अतीत का बड़ा सबक)
दिलचस्प बात यह है कि इस चुनावी परिणाम ने साल 2020 में हुए पिछले MLC चुनावों की यादें ताजा कर दी हैं। उस समय भी वाराणसी की इन दोनों सीटों (स्नातक और शिक्षक) पर समाजवादी पार्टी को ठीक इसी तरह बड़ी जीत मिली थी और तत्कालीन भाजपा प्रत्याशियों को हार का सामना करना पड़ा था।
• 2020 का सपा का अति-उत्साह: पिछली बार जब सपा ने वाराणसी का यह गढ़ जीता था, तो पूरे उत्तर प्रदेश में सपा कार्यकर्ताओं के बीच जबरदस्त उत्साह का माहौल बन गया था। राजनीतिक गलियारों में इस जीत को साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी का 'विजय शंखनाद' बताया जा रहा था और यह दावा किया जा रहा था कि प्रबुद्ध व युवा वर्ग योगी सरकार के खिलाफ जा चुका है।
• विधानसभा चुनाव में योगी की प्रचंड जीत: हालांकि, विधान परिषद के उस ट्रेंड को जब 2022 के मुख्य विधानसभा चुनाव में परखा गया, तो सारे कयास उल्टे साबित हुए। जब आम जनता ने पोलिंग बूथ पर जाकर मतदान किया, तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन करते हुए प्रचंड बहुमत (255+ सीटें) हासिल की और दोबारा सरकार बनाई। उस वक्त सपा का यह 'शंखनाद' और अति-उत्साह धराशायी हो गया था, क्योंकि MLC चुनाव का सीमित मतदाता वर्ग (सिर्फ स्नातक और शिक्षक) राज्य के आम जनमानस के संपूर्ण मिजाज का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। 

वरिष्ठ भाजपा नेता केदारनाथ सिंह का राजनीतिक सफर
केदारनाथ सिंह पूर्वांचल की राजनीति में भाजपा के सबसे मजबूत और भरोसेमंद स्तंभ रहे हैं। उनका राजनीतिक और व्यक्तिगत परिचय इस प्रकार है: 

1. शैक्षणिक पृष्ठभूमि: उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से वर्ष 1972 में स्नातक (Graduation) की उपाधि प्राप्त की और इसके बाद 1976 में वहीं से एलएलबी (LLB) यानी कानून की पढ़ाई पूरी की।
2. तीन बार का दबदबा: वे इस सीट से कुल तीन बार विधान परिषद के सदस्य (MLC) चुने जा चुके हैं। उन्होंने वर्ष 2004 (उपचुनाव), 2014 और 2018 में इस सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर शानदार जीत हासिल की थी।

संगठन के लिए आत्ममंथन की घंटी
एक तरफ जहाँ समाजवादी पार्टी इन दोनों जीतों को प्रबुद्ध वर्ग और युवाओं का सरकार की नीतियों के खिलाफ स्पष्ट जनादेश बता रही है, वहीं भाजपा के भीतर से ही उठे 'अहंकार और गलत टिकट वितरण' के सुरों ने आगामी चुनावों से पहले शीर्ष नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालांकि, इतिहास गवाह है कि MLC चुनाव की जीत को आगामी विधानसभा चुनावों की जीत की गारंटी नहीं माना जा सकता, लेकिन आंतरिक कलह और कार्यकर्ताओं का असंतोष दूर करना भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।


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