दो दशक पहले तक की तोपों की सलामी, दुर्लभ अस्त्र-शस्त्र और रामलीला की ऐतिहासिक साज-सज्जा को तलाशते रहे लोग
रामनगर, वाराणसी। विजयादशमी पर श्रीराम की रावण पर विजय के प्रतीक स्वरूप रामनगर दुर्ग से कुंवर अनंत नारायण सिंह का शाही विजय जुलूस मंगलवार की शाम परंपरागत अंदाज में निकला। राजसी वेशभूषा में स्वर्ण हौदे से सजे हाथी पर सवार कुंवर अनंत नारायण सिंह आकर्षण का केंद्र रहे। उनके पीछे चांदी के हौदों से सजे अलग-अलग हाथियों पर दोनों राजकुमार बड़े प्रद्युम्न नारायण सिंह और छोटे अनिरुद्ध नारायण सिंह सवार थे। हालांकि, इस बार की शाही सवारी में वह पुराना वैभव और भव्यता नजर नहीं आई, जिसे देखने के लिए कभी हजारों की भीड़ उमड़ती थी।
जुलूस में सबसे आगे बनारस स्टेट का झंडा लेकर दुर्ग के मुसाहिब चल रहे थे। उनके पीछे डंका वादक घुड़सवार और घुड़सवार पुलिस का दल था। इसके बाद कुंवर अनंत नारायण सिंह पारंपरिक राजसी वेशभूषा में ठीक शाम 4 बजकर 45 मिनट पर हाथी पर सवार होकर दुर्ग से बाहर निकले। उनके बाहर आते ही किले के ऊपरी बुर्ज पर मौजूद ताशा वादकों ने वादन शुरू किया। दुर्ग के बाहर खड़े लोगों ने हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ उनका अभिवादन किया। कुंवर ने भी हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन स्वीकार किया। इसके बाद शाही काफिला लंका स्थित रामलीला मैदान की ओर रवाना हुआ।
बटाऊबीर में शमी वृक्ष का पूजन, लंका में रणभूमि की परिक्रमा
रामनगर दुर्ग से लंका रामलीला मैदान तक लगभग तीन किलोमीटर के मार्ग पर दोनों ओर खड़े लोग शाही सवारी का अभिवादन करते रहे। रास्ते में बटाऊबीर पहुंचकर कुंवर अनंत नारायण सिंह ने शमी वृक्ष का पूजन किया और शांति के प्रतीक कबूतर छोड़े। इसके बाद शाही काफिला धीरे-धीरे लंका पहुंचा। वहां कुंवर ने रणभूमि की परिक्रमा की और फिर दुर्ग लौट आए।
दरबार हॉल में लगी राजदरबार की परंपरा
दुर्ग लौटने के बाद दरबार हॉल में परंपरागत रूप से दरबार लगा। इस दौरान दुर्ग के मुसाहिबों ने कुंवर को नजर पेश की। रिवाज के मुताबिक रुमाल में एक रुपये का सिक्का और पान का बीड़ा रखकर उन्हें भेंट किया गया। इस रस्म के जरिए राजपरंपरा की पुरानी परिपाटी का निर्वहन किया गया।
दोपहर में हुआ शस्त्र पूजन, पीएसी ने दी सलामी
विजयादशमी पर कुंवर अनंत नारायण सिंह ने परंपरागत तरीके से शस्त्र पूजन भी किया। वह दोपहर 2:30 बजे दुर्ग के झंडा गेट पर शस्त्र पूजन के लिए बैठे। उनके पहुंचने पर पीएसी के जवानों ने सलामी दी। पीएसी के बैंड दल ने भी सलामी धुन बजाई। ब्राह्मणों के दल ने विधि-विधान से पूजन संपन्न कराया। इसके बाद कुंवर ने दुर्ग स्थित मां काली और अपने कुल देवी-देवताओं के दर्शन-पूजन किए।
कहां खो गया शाही विजय जुलूस का पुराना वैभव?
रामनगर की विजयादशमी परंपरा में शाही सवारी का अपना विशिष्ट स्थान रहा है। कभी कुंवर के शस्त्र पूजन के दौरान दर्जन भर तोपों से सलामी दिए जाने की परंपरा आकर्षण का केंद्र हुआ करती थी। शाही जुलूस में संग्रहालय में रखे दुर्लभ प्राचीन अस्त्र-शस्त्र, रामलीला से जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री, तोपों का काफिला और हाथियों की बड़ी संख्या भी इसकी भव्यता बढ़ाते थे।
लेकिन इस बार जुलूस में इन पुराने आकर्षणों की कमी लोगों को खली। करीब दो दशक पहले तक दिखाई देने वाले तोपों के प्रदर्शन, दुर्लभ हथियारों और रामलीला से जुड़ी ऐतिहासिक साज-सज्जा को लोग तलाशते नजर आए। शाही सवारी में परंपराओं का निर्वहन तो हुआ, लेकिन उसके पुराने वैभव को लेकर लोगों के मन में सवाल भी दिखाई दिए।
कभी जिस शाही सवारी को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते थे, उसकी भव्यता अब पहले जैसी नहीं दिख रही। ऐसे में रामनगर की ऐतिहासिक विजयादशमी परंपरा के पुराने स्वरूप को सहेजने और उसके प्रमुख आकर्षणों को फिर से सामने लाने की अपेक्षा भी महसूस होती है।
शाही सवारी में आकर्षण बने रहे दोनों राजकुमार
कुंवर अनंत नारायण सिंह के दोनों पुत्र, बड़े राजकुमार प्रद्युम्न नारायण सिंह और छोटे राजकुमार अनिरुद्ध नारायण सिंह, भी शाही सवारी के प्रमुख आकर्षण रहे। दोनों अलग-अलग हाथियों पर सवार होकर अपने पिता के हाथी के पीछे चल रहे थे। कुंवर के हाथी पर सोने का हौदा सजा था, जबकि दोनों राजकुमारों के हाथियों पर चांदी के हौदे कसे गए थे।
रामनगर की विजयादशमी पर शाही विजय जुलूस ने एक बार फिर राजपरंपरा की झलक दिखाई। हालांकि, इस आयोजन ने यह सवाल भी खड़ा किया कि काशी की इस विशिष्ट ऐतिहासिक परंपरा से जुड़े पुराने वैभव और दुर्लभ विरासत को किस तरह संरक्षित कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए।