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BHU ट्रॉमा सेंटर में 62 आउटसोर्सिंग नियुक्तियों पर सवाल: जांच कमेटी ने भर्ती प्रक्रिया निरस्त करने की सिफारिश की



 15/Oct/26

नवंबर 2025 में हुई नियुक्तियों की जांच में चयन प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल, स्क्रीनिंग कमेटी के गठन और अभ्यर्थियों की योग्यता की जांच में सामने आईं कथित अनियमितताएं

काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के ट्रॉमा सेंटर में 62 आउटसोर्सिंग कर्मचारियों की नियुक्तियों को लेकर विवाद गहरा गया है। नवंबर 2025 में हुई इन नियुक्तियों की जांच के लिए गठित पांच सदस्यीय कमेटी ने कथित अनियमितताओं की ओर इशारा करते हुए भर्ती प्रक्रिया निरस्त करने और पारदर्शी तरीके से नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश की है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जांच रिपोर्ट आईएमएस-बीएचयू के निदेशक प्रो. एसएन शंखवार को सौंप दी गई है।

इस मामले में भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता, अभ्यर्थियों के शैक्षणिक दस्तावेजों के सत्यापन और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। हालांकि, नियुक्तियों को निरस्त करने, संबंधित एजेंसी को ब्लैकलिस्ट करने या अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के संबंध में अंतिम निर्णय की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।

62 पदों के लिए 62 ही बायोडाटा मिलने पर उठे सवाल

भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल अभ्यर्थियों के आवेदनों की संख्या को लेकर है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, ट्रॉमा सेंटर में रेडियोग्राफर, ओटी टेक्नीशियन और लैब टेक्नीशियन सहित विभिन्न तकनीकी पदों पर कुल 62 कर्मचारियों की आवश्यकता थी। दावा है कि इन पदों के लिए आउटसोर्सिंग एजेंसी को कुल 62 ही बायोडाटा प्राप्त हुए।

भर्ती प्रक्रिया में पदों की संख्या और प्राप्त बायोडाटा की संख्या समान होने के इस तथ्य ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं। जांच कमेटी ने कथित तौर पर इस स्थिति को गंभीरता से लिया और भर्ती प्रक्रिया के विभिन्न चरणों की समीक्षा की।

हालांकि, केवल पदों और आवेदनों की संख्या समान होने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि नियुक्तियां पहले से तय थीं। इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए आवेदन प्राप्त होने की प्रक्रिया, विज्ञापन के प्रसार, अभ्यर्थियों की सूची और चयन के दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।

स्क्रीनिंग कमेटी के गठन और दस्तावेजों के सत्यापन पर सवाल

जांच में भर्ती प्रक्रिया के दौरान निर्धारित प्रक्रियाओं के पालन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट से संबंधित उपलब्ध विवरण के अनुसार, अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की जांच के लिए स्क्रीनिंग कमेटी के गठन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं थी।

इसके अलावा, चयनित अभ्यर्थियों की सूची, आवेदन पत्रों और संबंधित दस्तावेजों को विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष सत्यापन के लिए प्रस्तुत किए जाने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठे हैं।

यदि नियुक्तियों के दौरान निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो इससे भर्ती की निष्पक्षता और तकनीकी पदों पर योग्य अभ्यर्थियों के चयन की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। मामले में यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि संबंधित एजेंसी, विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारियों और ट्रॉमा सेंटर प्रबंधन की जिम्मेदारियां क्या थीं तथा किस स्तर पर प्रक्रियागत चूक हुई।

रेडियोग्राफर पद पर बीएड डिग्रीधारी की नियुक्ति का दावा

इस पूरे मामले में तकनीकी पदों पर नियुक्त अभ्यर्थियों की शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। उपलब्ध विवरण में दावा किया गया है कि रेडियोग्राफर के पद पर बीएड डिग्रीधारी एक अभ्यर्थी को नियुक्त किया गया था।

रेडियोग्राफी एक विशेष तकनीकी क्षेत्र है, जिसमें संबंधित पद के लिए निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, प्रशिक्षण और आवश्यक व्यावसायिक दक्षता महत्वपूर्ण होती है। ऐसे पदों पर नियुक्ति से पहले अभ्यर्थियों की योग्यता का निर्धारित मानकों के अनुरूप सत्यापन किया जाना आवश्यक है।

यदि संबंधित अभ्यर्थी के पास पद के लिए अनिवार्य तकनीकी योग्यता नहीं थी, तो यह नियुक्ति प्रक्रिया की गंभीर जांच का विषय है। हालांकि, इस दावे की पुष्टि के लिए संबंधित पद की भर्ती अधिसूचना, अभ्यर्थी के शैक्षणिक दस्तावेजों और जांच कमेटी की मूल रिपोर्ट का परीक्षण जरूरी है।

तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में

नियुक्तियां नवंबर 2025 में ट्रॉमा सेंटर के तत्कालीन प्रोफेसर इंचार्ज प्रो. सौरभ सिंह के कार्यकाल में हुई थीं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, जांच कमेटी ने तत्कालीन डिप्टी रजिस्ट्रार, असिस्टेंट रजिस्ट्रार और संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं।

अब यह जांच का महत्वपूर्ण पहलू होगा कि भर्ती प्रक्रिया को किस स्तर पर स्वीकृति मिली, आउटसोर्सिंग एजेंसी को क्या निर्देश दिए गए थे और चयनित अभ्यर्थियों के दस्तावेजों का सत्यापन किस अधिकारी या समिति की जिम्मेदारी थी।

किसी अधिकारी की भूमिका पर सवाल उठना और उसकी जिम्मेदारी साबित होना अलग-अलग बातें हैं। इसलिए संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उनके पक्ष, उपलब्ध अभिलेखों और जांच रिपोर्ट में दर्ज तथ्यों का परीक्षण जरूरी होगा।

जांच कमेटी की सिफारिश के बाद आगे क्या?

जांच रिपोर्ट में भर्ती प्रक्रिया निरस्त कर नए सिरे से पारदर्शी चयन प्रक्रिया शुरू करने की सिफारिश किए जाने की जानकारी सामने आई है। अब आगे की कार्रवाई विश्वविद्यालय प्रशासन के निर्णय पर निर्भर करेगी।

यदि सक्षम प्राधिकारी जांच निष्कर्षों से सहमत होते हैं, तो नियमानुसार नियुक्तियों की समीक्षा, संबंधित अभ्यर्थियों की पात्रता का पुनः सत्यापन और भर्ती प्रक्रिया में जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की जांच जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।

आउटसोर्सिंग एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई या किसी अधिकारी पर विभागीय अथवा कानूनी कार्रवाई किए जाने के संबंध में भी अंतिम निर्णय संबंधित प्रावधानों और जांच के निष्कर्षों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।

फिलहाल इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि क्या जांच रिपोर्ट के आधार पर नियुक्तियों को निरस्त करने का औपचारिक आदेश जारी होगा और भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के लिए जिम्मेदारी किसकी तय की जाएगी।

BHU प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी निगाहें

बीएचयू का ट्रॉमा सेंटर गंभीर मरीजों के उपचार की दृष्टि से महत्वपूर्ण संस्थान है। ऐसे में तकनीकी पदों पर नियुक्तियों की पारदर्शिता और कर्मचारियों की निर्धारित योग्यता सुनिश्चित करना विशेष महत्व रखता है।

62 आउटसोर्सिंग नियुक्तियों से जुड़े इस मामले में जांच कमेटी की सिफारिशों, विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदम और संबंधित पक्षों के आधिकारिक बयानों पर अब सबकी निगाहें टिकी हैं। मामले की पूरी तस्वीर स्पष्ट होने के लिए जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों और प्रशासनिक निर्णय की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।

क्लाउन टाइम्स इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन के आधिकारिक पक्ष और आगे होने वाली कार्रवाई से जुड़ी जानकारी मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट करेगा।


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