हनुमान सभी को अपने लौटने की प्रतीक्षा करने के लिए कहकर समुद्र लांघने निकल पड़े। मार्ग में मैनाक पर्वत ने उन्हें विश्राम करने का आग्रह किया। हनुमान जैसे ही पर्वत पर चढ़े, वह धंस गया। हनुमान ने स्पष्ट किया कि प्रभु श्रीराम का कार्य पूरा किए बिना वह विश्राम नहीं करेंगे।
आगे सुरसा ने हनुमान का रास्ता रोक लिया। उसने कहा कि देवताओं ने आज उसे अच्छा आहार दिया है। हनुमान ने पहले लौटते समय उसके पास आने की बात कही, लेकिन सुरसा नहीं मानी। वह अपना मुंह फैलाने लगी तो हनुमान भी अपना आकार बढ़ाने लगे। जब सुरसा ने अपना मुंह सौ योजन तक फैला लिया, तब हनुमान ने सूक्ष्म रूप धारण कर उसके मुंह में प्रवेश किया और तत्काल बाहर निकल आए। उनकी चतुराई देखकर सुरसा प्रसन्न हुई और उन्हें आगे जाने दिया।
इसके बाद हनुमान ने मच्छर का सूक्ष्म रूप धारण कर लंका में प्रवेश किया। वहां लंकिनी नाम की राक्षसी ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। हनुमान के प्रहार से उसके मुंह से रक्त निकल आया। लंकिनी ने इसे राक्षसों के विनाश का संकेत बताते हुए कहा कि अब लंका का अंत निश्चित है।
लंका में हनुमान की भेंट रामनाम जप रहे विभीषण से हुई। विभीषण ने उन्हें बताया कि माता सीता अशोक वाटिका में हैं। दूसरी ओर, रावण सीता को प्रताड़ित करने के लिए राक्षसियों को आदेश देता है। रावण के वहां से जाने के बाद हनुमान ने श्रीराम की मुद्रिका माता सीता के सामने गिराई और रामकथा सुनाकर उन्हें अपने आने का विश्वास दिलाया। सीता के आग्रह पर हनुमान उनके सामने प्रकट हुए और श्रीराम का संदेश सुनाया।
माता सीता से आज्ञा लेकर हनुमान भूख मिटाने के लिए अशोक वाटिका के फल खाने लगे और देखते ही देखते वाटिका उजाड़ने लगे। इसकी सूचना मिलने पर क्रोधित रावण ने अपने पुत्र अक्षय कुमार को हनुमान को पकड़ने के लिए भेजा। भीषण युद्ध में हनुमान ने अक्षय कुमार का वध कर दिया। इसके बाद रावण ने मेघनाद को भेजा। मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर हनुमान को बंदी बनाया और रावण के दरबार में ले आया।
रावण ने दंडस्वरूप हनुमान की पूंछ में आग लगवा दी। इसके बाद हनुमान ने अपना विशाल रूप धारण कर पूरी लंका में आग लगा दी। सोने की लंका धू-धू कर जलने लगी। लंका दहन के बाद हनुमान माता सीता के पास पहुंचे और उनसे कोई निशानी देने का आग्रह किया। सीता ने अपनी चूड़ामणि उतारकर उन्हें दे दी और श्रीराम तक अपना संदेश पहुंचाने को कहा।
माता सीता को धैर्य रखने का आश्वासन देकर हनुमान समुद्र लांघकर श्रीराम के पास पहुंचे और उन्हें पूरा समाचार सुनाया। माता सीता की कुशलता का समाचार पाकर श्रीराम ने हनुमान को गले से लगा लिया। आरती के बाद 19वें दिन की रामलीला को विश्राम दिया गया।