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काशी से मेहसाणा तक GI पहचान की पहल, गुजरात के पारंपरिक हैंडलूम उत्पादों का आवेदन दाखिल



 12/Oct/26

पद्मश्री डॉ. रजनीकांत की पहल पर ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया शुरू, वडनगर की ऐतिहासिक बुनकरी परंपरा को मिलेगी नई पहचान

वाराणसी। गुजरात के मेहसाणा जिले के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है। पद्मश्री डॉ. रजनीकांत के नेतृत्व में ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ के नाम से GI आवेदन दाखिल किया गया है। इस पहल का उद्देश्य उत्तर गुजरात की पारंपरिक बुनकरी विरासत को संरक्षित करने के साथ स्थानीय कारीगरों के कौशल और उत्पादों को व्यापक पहचान दिलाना है। इस प्रक्रिया को नाबार्ड और एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (EDII), गांधीनगर का सहयोग मिला है।

काशी से गुजरात की बुनकरी विरासत को पहचान दिलाने की पहल

पारंपरिक उत्पादों को GI पहचान दिलाने के लिए काम करने वाले पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने इस पहल को काशी की ओर से गुजरात की सांस्कृतिक और शिल्प विरासत के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सुशासन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उनके गृह जिले मेहसाणा की पारंपरिक बुनकरी को पहचान दिलाने का प्रयास किया गया है।

इस पहल के माध्यम से मेहसाणा के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों की विशिष्टता को सामने लाने और बुनकरों की पीढ़ियों से चली आ रही कला के संरक्षण की दिशा में काम किया जा रहा है।

18वीं शताब्दी से जुड़ी है मेहसाणा की बुनकरी परंपरा

गुजरात का मेहसाणा जिला अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक वस्त्र निर्माण के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र की बुनकरी परंपरा का संबंध ऐतिहासिक नगर वडनगर और आसपास के बुनकर गांवों से रहा है।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1961 की जनगणना संबंधी रिपोर्टों में मेहसाणा के प्रमुख कुटीर उद्योगों में हथकरघा बुनाई का उल्लेख मिलता है। वडनगर को पारंपरिक मशरू वस्त्र निर्माण के केंद्रों में भी शामिल किया गया है।

मेहसाणा जिले के रिदरोल, नारदीपुर और आसपास के गांवों में पारंपरिक बुनाई के साथ कलात्मक ब्रोकेड वस्त्र तैयार करने की परंपरा रही है। यहां के बुनकर सूती चादरें, बेडकवर, तौलिए, तकिए के गिलाफ और विभिन्न रंगों एवं डिजाइनों वाले अन्य हथकरघा उत्पाद बनाते हैं।

वस्त्र मंत्रालय के हथकरघा संबंधी अभिलेखों में जिले के लींच गांव के बुनकरों द्वारा प्लेन और ट्विल बुनाई के साथ मल्टी-ट्रेडल तकनीक के इस्तेमाल का भी उल्लेख मिलता है।

वडनगर की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी है पहचान

गुजरात का ऐतिहासिक नगर वडनगर अपनी प्राचीन पुरातात्विक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में पारंपरिक वस्त्र निर्माण की तकनीकें, स्थानीय बुनकरों का पीढ़ीगत कौशल और विशिष्ट बुनाई शैली मेहसाणा के हथकरघा उत्पादों को अलग पहचान प्रदान करती हैं।

‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ को GI पहचान मिलने की प्रक्रिया आगे बढ़ने से इन उत्पादों की भौगोलिक विशिष्टता स्थापित करने, पारंपरिक बुनकरी को संरक्षित करने और स्थानीय कारीगरों के हितों को मजबूत करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

क्या है GI टैग और बुनकरों को कैसे मिलेगा लाभ?

भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या अन्य विशेषताएं उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती हैं। यह पहचान पारंपरिक शिल्प, हथकरघा उत्पादों, कृषि उपज और अन्य क्षेत्र-विशिष्ट उत्पादों के लिए महत्वपूर्ण होती है।

मेहसाणा के हथकरघा उत्पादों को GI पंजीकरण मिलने पर उनकी क्षेत्रीय पहचान को औपचारिक मान्यता मिल सकती है। इससे पारंपरिक बुनकरी की विरासत के संरक्षण, उत्पादों की विशिष्टता के प्रचार और बाजार में उनकी पहचान मजबूत करने में मदद मिलने की संभावना है।

देश के 25 राज्यों में पारंपरिक उत्पादों को GI पहचान दिलाने का प्रयास

डॉ. रजनीकांत के अनुसार, उनके प्रयासों से देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 650 पारंपरिक उत्पादों के GI आवेदनों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा चुकी है। गुजरात में भी पारंपरिक शिल्प, हथकरघा और आदिवासी उत्पादों को GI पहचान दिलाने के लिए पहल की गई है।

उनके मुताबिक, गुजरात के आठ उत्पादों को GI स्वीकृति मिल चुकी है। ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ का आवेदन इसी अभियान की एक नई कड़ी है।

GI आवेदन दाखिल, अंतिम पंजीकरण का इंतजार

मेहसाणा के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों के लिए GI आवेदन दाखिल होना इस दिशा में शुरुआती कदम है। आवेदन दाखिल करने और GI टैग का अंतिम पंजीकरण मिलने के बीच अंतर है। संबंधित प्रक्रिया पूरी होने और निर्धारित मानकों पर विचार के बाद ही अंतिम पंजीकरण की स्थिति स्पष्ट होगी।

काशी से शुरू हुई यह पहल उत्तर गुजरात की पारंपरिक बुनकरी को व्यापक पहचान दिलाने और पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखने वाले कारीगरों की विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


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