रामनगर, वाराणसी। विश्वप्रसिद्ध Ramnagar Ki Ramleela की भीड़ में ऐसे अनगिनत रामभक्त मिल जाएंगे, जो पूरे एक महीने तक अपने जीवन को प्रभु श्रीराम की भक्ति और रामकथा के रंग में रंग लेते हैं। इन्हीं रामभक्तों में एक हैं नियमित लीला नेमी मुकेश कसेरा, जिनके रोम-रोम में प्रभु श्रीराम बसे हैं। पिछले दस वर्षों से अधिक समय से रामलीला का नियमित दर्शन कर रहे मुकेश की आस्था पर न ठंड का असर पड़ता है और न ही बरसात उन्हें अपने संकल्प से डिगा पाती है।
मुकेश कसेरा की दिनचर्या का खास हिस्सा बन चुकी रामनगर की रामलीला उनके लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि जीवन को समझने और संस्कारों को आत्मसात करने का माध्यम है। लीला शुरू होने से पहले ही वे मंच के पास अपना आसन लगाकर बैठ जाते हैं और पूरी तन्मयता से कथा, चौपाइयों और उनके भावार्थ का श्रवण करते हैं।
मुकेश कसेरा का कहना है कि रामचरितमानस की चौपाइयों का भावार्थ सुनकर ऐसा लगता है, मानो जीवन धन्य हो गया हो। रामनगर की रामलीला में बहने वाली भक्ति और भाव रस की धारा उन्हें गुरु की शिक्षा और दीक्षा से प्राप्त ज्ञान के अमृत जैसी अनुभूति कराती है।
उनके लिए यहां का हर प्रसंग केवल देखने-सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने वाली सीख है। भगवान श्रीराम के आदर्श, त्याग, मर्यादा और परिवार के प्रति समर्पण जैसे प्रसंग उन्हें भीतर तक प्रभावित करते हैं।
मुकेश कसेरा बताते हैं कि जब भरत के आगमन पर अयोध्या के राजपरिवार के सदस्य एकत्र होते हैं और उनके बीच संवाद व विचार सामने आते हैं, तो उन्हें अपने परिवार की याद आने लगती है। चारों भाइयों के बीच अद्भुत प्रेम, त्याग और आपसी सम्मान उन्हें विशेष रूप से प्रभावित करता है।
उनका मानना है कि समाज को राजा दशरथ के परिवार से एकजुटता, पारस्परिक प्रेम और रिश्तों की गरिमा की सीख लेनी चाहिए। जिस तरह अयोध्या के राजपरिवार में कठिन परिस्थितियों के बावजूद आपसी संबंधों और मर्यादा को महत्व दिया गया, उसी तरह आज के परिवारों को भी प्रेम और एकता के साथ रहना चाहिए।
मुकेश कसेरा जैसे लीला नेमी ही Ramnagar Ki Ramleela की जीवंत परंपरा को पीढ़ियों तक आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी नियमित उपस्थिति और अटूट श्रद्धा बताती है कि रामनगर की रामलीला केवल मंच पर अभिनीत कथा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आस्था, संस्कार और जीवनशैली से जुड़ी परंपरा है।