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काशी से वडनगर तक बिछी GI की बिसात, प्रधानमंत्री मोदी के गृह जिले मेहसाणा के हैंडलूम उत्पाद को मिला GI आवेदन का रास्ता



 10/Oct/26

पद्मश्री डॉ. रजनीकांत की पहल पर ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ का भौगोलिक संकेतक (GI) आवेदन दाखिल, उत्तर गुजरात की पारंपरिक बुनकरी विरासत को पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

वाराणसी। भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक शिल्प और ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को आगे बढ़ाने की दिशा में काशी से एक महत्वपूर्ण पहल हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात के मेहसाणा जिले के पारंपरिक हथकरघा उत्पादों को भौगोलिक संकेतक (GI) पहचान दिलाने के लिए आवेदन दाखिल किया गया है। ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ के नाम से की गई इस पहल को उत्तर गुजरात की सदियों पुरानी वस्त्र निर्माण परंपरा के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

इस पहल का नेतृत्व पद्मश्री डॉ. रजनीकांत ने किया है, जिन्हें पारंपरिक उत्पादों को GI पहचान दिलाने के प्रयासों के लिए ‘GI मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने इस पहल को काशी की ओर से गुजरात की सांस्कृतिक और शिल्प विरासत को दिया गया विशेष उपहार बताया है।

25 वर्षों के सेवा संकल्प पर काशी की ओर से विशेष पहल

डॉ. रजनीकांत के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में सुशासन के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर उनके गृह जिले मेहसाणा की पारंपरिक बुनकरी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रयास किया गया है। उनका कहना है कि काशी से शुरू हुई यह पहल स्थानीय कारीगरों की विरासत को संरक्षित करने और पारंपरिक उत्पादों को व्यापक पहचान दिलाने के संकल्प से जुड़ी है।

इस ऐतिहासिक पहल को नाबार्ड और एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (EDII), गांधीनगर के सहयोग से आगे बढ़ाया गया।

18वीं शताब्दी से जुड़ा है मेहसाणा के वस्त्रों का इतिहास

मेहसाणा जिले की पारंपरिक हथकरघा बुनाई उत्तर गुजरात की समृद्ध वस्त्र एवं शिल्प विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका सांस्कृतिक संबंध ऐतिहासिक नगर वडनगर और आसपास के बुनकर क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।

उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, मेहसाणा क्षेत्र में हथकरघा बुनाई की परंपरा लंबे समय से प्रचलित रही है। वर्ष 1961 की जनगणना संबंधी ऐतिहासिक रिपोर्टों में इस क्षेत्र के प्रमुख कुटीर उद्योगों में हथकरघा बुनाई का उल्लेख मिलता है। वडनगर को पारंपरिक मशरू वस्त्र निर्माण के केंद्रों में भी दर्ज किया गया है।

मेहसाणा के रिदरोल, नारदीपुर और आसपास के गांवों में पारंपरिक बुनाई के साथ कलात्मक ब्रोकेड वस्त्र तैयार करने की परंपरा रही है। जिले के बुनकर सूती चादरें, बेडकवर, तौलिए, तकिए के गिलाफ और विभिन्न रंगों व डिजाइनों के अन्य हथकरघा उत्पाद तैयार करते हैं।

वस्त्र मंत्रालय के हथकरघा संबंधी अभिलेखों में मेहसाणा जिले के लींच गांव के बुनकरों द्वारा प्लेन एवं ट्विल बुनाई तथा मल्टी-ट्रेडल तकनीक से वस्त्र निर्माण का उल्लेख भी मिलता है।

वडनगर की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ाव

वडनगर गुजरात का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक नगर है, जिसकी पुरातात्विक विरासत हजारों वर्षों पुरानी मानी जाती है। इस क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान, स्थानीय बुनकरों का पीढ़ीगत कौशल और पारंपरिक वस्त्र निर्माण की तकनीकें मेहसाणा के हथकरघा उत्पादों को विशिष्टता प्रदान करती हैं।

GI पहचान मिलने की प्रक्रिया आगे बढ़ने से इस पारंपरिक विरासत को संरक्षित करने, उत्पादों की विशिष्ट भौगोलिक पहचान स्थापित करने और बुनकरों के हितों को मजबूत करने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

देशभर में GI पहचान के लिए डॉ. रजनीकांत के प्रयास

डॉ. रजनीकांत के अनुसार, उनके प्रयासों से देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 650 पारंपरिक उत्पादों के GI आवेदनों की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा चुकी है। गुजरात में भी पारंपरिक उत्पादों, शिल्प, हथकरघा और आदिवासी उत्पादों को GI पहचान दिलाने के लिए पहल की गई है। उनके मुताबिक, गुजरात के आठ उत्पादों को GI स्वीकृति भी मिल चुकी है, जिनमें सूरत डायमंड का नाम शामिल है।

मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट का आवेदन इस अभियान की एक नई कड़ी है। यह पहल स्थानीय बुनकरों की परंपरा को पहचान दिलाने के साथ-साथ पारंपरिक भारतीय शिल्प को संरक्षित करने की व्यापक मुहिम से भी जुड़ी है।

फिलहाल ‘मेहसाणा हैंडलूम प्रोडक्ट’ के लिए GI आवेदन दाखिल किया गया है। आवेदन दाखिल होना और GI पंजीकरण की अंतिम स्वीकृति मिलना अलग-अलग चरण हैं। अंतिम पंजीकरण संबंधित प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही माना जाएगा।

काशी से शुरू हुई यह पहल इस उम्मीद के साथ आगे बढ़ रही है कि मेहसाणा की पारंपरिक बुनकरी को नई पहचान मिलेगी और पीढ़ियों से इस विरासत को संजो रहे कारीगरों के कौशल को व्यापक मंच प्राप्त होगा।


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