यह कार्यक्रम 7 अक्टूबर को सनबीम स्कूल भगवानपुर एवं सनबीम सनसिटी, 8 अक्टूबर को सनबीम स्कूल लहरतारा एवं सारनाथ तथा 9 अक्टूबर को सनबीम स्कूल वरुणा में आयोजित किया गया। विभिन्न शाखाओं में विद्यार्थियों ने अमिश त्रिपाठी से सीधे संवाद कर उनके विचार सुने और भारतीय इतिहास को नए दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया।
कार्यक्रम के दौरान पुस्तक ‘ध्रुव-तारा’ का लोकार्पण किया गया। पुस्तक के माध्यम से विद्यार्थियों को भारत के इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और समृद्ध विरासत से जुड़ी जानकारियों से परिचित कराया गया। वहीं, ‘द ग्रेट इंडियन हिस्ट्री क्विज’ ने विद्यार्थियों को इतिहास से जुड़े सवालों के माध्यम से अपनी जानकारी परखने और नई चीजें सीखने का अवसर दिया।
सनबीम शिक्षण समूह के चेयरपर्सन डॉ. दीपक मधोक ने कहा कि इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य की दिशा निर्धारित करने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। उन्होंने विद्यार्थियों से पुस्तकों को अपना साथी बनाने और निरंतर सीखते रहने का आह्वान किया।
वाइस चेयरपर्सन श्रीमती भारती मधोक ने कहा कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए पाठ्यपुस्तकों के साथ साहित्य, इतिहास और समसामयिक ज्ञान से जुड़ाव भी आवश्यक है। उन्होंने अमिश त्रिपाठी जैसे लोकप्रिय लेखक के साथ संवाद को विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायी अनुभव बताया।
समूह की निदेशिका श्रीमती अमृता बर्मन ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि विद्यार्थियों में पढ़ने की आदत विकसित करना और उन्हें अपनी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना विद्यालय की प्राथमिकताओं में शामिल है। ऐसे आयोजन विद्यार्थियों की जिज्ञासा बढ़ाने के साथ उन्हें पुस्तकों और ज्ञान की दुनिया से जोड़ते हैं।
विद्यालय की प्रधानाचार्या डॉ. अनुपमा मिश्रा ने विद्यार्थियों को नियमित रूप से अच्छी पुस्तकें पढ़ने, प्रश्न पूछने और प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन से जोड़ने के लिए प्रेरित किया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण अमिश त्रिपाठी द्वारा कुछ पुस्तकों पर स्वयं हस्ताक्षर करना रहा। लेखक से मुलाकात और उनकी पुस्तक पर हस्ताक्षर प्राप्त कर विद्यार्थियों में खासा उत्साह देखने को मिला।
सनबीम शिक्षण समूह की इस पहल ने विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम से आगे बढ़कर इतिहास, संस्कृति और साहित्य की व्यापक दुनिया से जोड़ने का प्रयास किया। कार्यक्रम का संदेश रहा कि बच्चों को केवल उपहार ही नहीं, बल्कि पढ़ने की खुशी और अपनी गौरवशाली विरासत को जानने का अवसर भी देना चाहिए।