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श्रीराम की खड़ाऊं लेकर अयोध्या लौटे भरत, नंदीग्राम में रहने का लिया संकल्प



 08/Oct/26

रामनगर। श्रीराम के वनवास के बाद भरत का त्याग, भाई के प्रति उनका प्रेम और रघुकुल की मर्यादा का पालन—रामनगर की विश्व प्रसिद्ध Ramnagar Ki Ramleela में 14वें दिन इन्हीं भावपूर्ण प्रसंगों का मंचन किया गया। चित्रकूट में श्रीराम और भरत के मिलन के बाद भरत श्रीराम की खड़ाऊं लेकर अयोध्या लौटे और उसे राजसिंहासन पर स्थापित कर स्वयं नंदीग्राम में रहने का संकल्प लिया।

लीला प्रसंग के अनुसार भरत श्रीराम को अयोध्या वापस ले जाने के लिए चित्रकूट पहुंचे थे। भरत की इच्छा थी कि श्रीराम अयोध्या लौटकर राजपाट संभालें, लेकिन श्रीराम ने पिता के वचन और रघुकुल की मर्यादा का स्मरण कराते हुए भरत को समझाया कि वचन निभाने से बढ़कर कुछ नहीं है।

श्रीराम के समझाने पर भरत उनकी बात मान गए, लेकिन उन्होंने श्रीराम से उनकी खड़ाऊं मांग ली, ताकि अयोध्या के सिंहासन पर श्रीराम की उपस्थिति और अधिकार का प्रतीक बनी रहे।

अयोध्या लौटने से पहले भरत ने चित्रकूट के पावन स्थलों के दर्शन और परिक्रमा करने की इच्छा व्यक्त की। अत्रि मुनि के कहने पर भरत ने पर्वत के समीप स्थित एक कूप में श्रीराम के राज्याभिषेक के लिए लाए गए विभिन्न तीर्थों के जल को रखा। अत्रि मुनि ने उस कूप का नाम भरत कूप रखा।

लीला में श्रीराम ने भरत कूप की महिमा का वर्णन करते हुए उसके जल को पवित्र और कल्याणकारी बताया। इसके बाद चित्रकूट की परिक्रमा पूरी कर भरत ने श्रीराम से अयोध्या लौटने की आज्ञा मांगी।

भरत की भावनाओं को समझते हुए श्रीराम ने अपनी खड़ाऊं उतारकर उन्हें सौंप दी। भरत ने श्रद्धापूर्वक खड़ाऊं को अपने सिर पर धारण किया और श्रीराम से विदा लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।

चित्रकूट में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की आरती के बाद लीला प्रेमी भरत जी के साथ अयोध्या लौटे। अयोध्या पहुंचकर भरत ने विधि-विधान के साथ श्रीराम की खड़ाऊं को राजसिंहासन पर स्थापित किया। इसके बाद उन्होंने शत्रुघ्न को अयोध्या की जिम्मेदारी सौंपी और स्वयं नंदीग्राम चले गए।

नंदीग्राम में भरत ने पर्णकुटी बनाकर तपस्वी जीवन व्यतीत करने का संकल्प लिया। वहीं भरत जी की आरती के साथ 14वें दिन की लीला को विश्राम दिया गया।

Ramnagar Ki Ramleela में भरत का यह प्रसंग त्याग, भाई-प्रेम, कर्तव्य और मर्यादा की उस परंपरा को जीवंत करता है, जिसमें सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण धर्म और वचन को माना गया है।


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