जब सीता जी को सपने में दिखे भरत, लक्ष्मण ने सेना देखकर युद्ध की ठानी
रामनगर। विश्व प्रसिद्ध रामनगर की Ramleela के बारहवें दिन भरत के त्याग, भातृ प्रेम और श्रीराम-भरत मिलन से जुड़े भावपूर्ण प्रसंगों का मंचन किया गया। भरत को चतुरंगिणी सेना के साथ श्रीराम से मिलने वन की ओर जाते देख इंद्रदेव भी चिंतित हो उठे। उधर चित्रकूट में सीता जी ने श्रीराम को स्वप्न में भरत के आने की बात बताई, तो दूसरी ओर सेना को देखकर लक्ष्मण के मन में संदेह उत्पन्न हो गया।
प्रसंग के अनुसार भारद्वाज मुनि के आश्रम से भरत श्रीराम से मिलने के लिए आगे बढ़े। जब इंद्रदेव को इसकी जानकारी हुई तो वे घबरा गए। उन्होंने बृहस्पति से उपाय करने को कहा कि किसी तरह भरत की श्रीराम से भेंट न हो सके, अन्यथा उनकी बनाई हुई योजना बिगड़ जाएगी। हालांकि बृहस्पति ने इस बात से इन्कार कर दिया।
इसके बाद भरत अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ श्रीराम को खोजते हुए आगे बढ़े और उनके बारे में पूछते-पता करते पयस्वनी नदी के किनारे पहुंचे। इसी दौरान चित्रकूट में सीता जी ने श्रीराम से कहा कि उन्होंने रात्रि में स्वप्न देखा है कि भरत उनके पास आए हैं।
इधर भारी-भरकम सेना के साथ भरत को आते देखकर लक्ष्मण के मन में आशंका पैदा हो गई। उन्होंने कहा कि भरत राजपद प्राप्त करने के बाद धर्म की मर्यादा भूल गए हैं और संभवतः युद्ध करने के लिए आ रहे हैं। लक्ष्मण ने भरत को सबक सिखाने तक की बात कही।
तभी आकाशवाणी हुई कि बिना विचार किए जल्दबाजी में किए गए कार्य के बाद मनुष्य को पछताना पड़ता है। आकाशवाणी सुनने के बाद श्रीराम ने लक्ष्मण को समझाया कि भरत के मन में राजमद हो ही नहीं सकता। श्रीराम ने भरत के प्रति अपने अटूट विश्वास को प्रकट किया।
गुरु की आज्ञा से भरत, शत्रुघ्न और निषादराज के साथ श्रीराम से मिलने आगे बढ़े। जैसे ही भरत ने श्रीराम को देखा, वे भावविह्वल होकर “पाहिं नाथ, पाहिं गोसाईं” कहते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। भरत को इस अवस्था में देखकर श्रीराम नंगे पांव दौड़ पड़े और उन्हें उठाकर गले से लगा लिया।
चित्रकूट में चारों भाइयों के इस भावपूर्ण मिलन का दृश्य देखकर रामलीला प्रेमियों की आंखें छलक उठीं। भाई-भाई के प्रेम, त्याग और समर्पण का यह प्रसंग उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत भावुक कर देने वाला रहा।
इस दौरान कैकेयी को उदास खड़ा देखकर श्रीराम ने उन्हें सांत्वना दी और कहा कि यह संसार ईश्वर के अधीन है, इसलिए माता को लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद श्रीराम सभी को अपनी कुटिया में ले गए।
उधर भरत को रात में नींद नहीं आई। उनके मन में यही विचार चलता रहा कि श्रीराम अयोध्या लौटेंगे या नहीं। इसी भाव के साथ बारहवें दिन की रामलीला की आरती संपन्न हुई।
रामनगर की परंपरागत Ramleela के इस प्रसंग में भरत चतुरंगिणी सेना के साथ श्रीराम को अयोध्या वापस लाने के लिए वन की ओर प्रस्थान करते हैं। निषादराज से भेंट के बाद गंगा-यमुना को पार करते हुए वे चित्रकूट के निकट पहुंचते हैं, जहां आगे चलकर चारों भाइयों का अद्भुत मिलन होता है।