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भरत चले चित्रकूट, श्रीराम को मनाकर वापस लाने



 05/Oct/26

“हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ”—रामनगर रामलीला में दिखा भरत का त्याग और भातृ प्रेम

रामनगर। श्रीराम के वनवास के बाद अयोध्या लौटे भरत जब उन्हें वनवास की पूरी घटना का पता चलता है तो उनका हृदय व्यथित हो उठता है। भरत जैसा आदर्श चरित्र विरल ही मिलता है। उनका भातृ प्रेम, त्याग और धर्म के प्रति समर्पण युगों-युगों से मिसाल बना हुआ है। रामनगर की विश्वप्रसिद्ध Ramnagar Ki Ramleela के ग्यारहवें दिन इसी प्रसंग का भावपूर्ण मंचन किया गया।

भरत ननिहाल से अयोध्या लौटे तो उन्होंने माता कैकेयी से अयोध्या का हाल पूछा। कैकेयी ने बताया कि उन्होंने सब ठीक कर दिया है, लेकिन विधाता ने एक काम बिगाड़ दिया और महाराज दशरथ सुरधाम चले गए। पिता के निधन और श्रीराम के वनवास का पूरा वृतांत सुनते ही भरत कैकेयी पर फट पड़े। उन्होंने अपनी माता को कठोर शब्द कहे और कहा कि ऐसा वर मांगते समय उनकी जीभ गल क्यों नहीं गई।

जब भरत को पता चला कि इस पूरे घटनाक्रम के पीछे मंथरा की भूमिका थी तो शत्रुघ्न का क्रोध फूट पड़ा। उन्होंने मंथरा को पकड़ लिया। भरत ने शत्रुघ्न को रोकते हुए कहा कि स्त्री वध करने से भैया श्रीराम प्रसन्न नहीं होंगे।

माता कैकेयी की करनी सुनकर भरत स्वयं को भी कोसने लगे। इसके बाद वे माता कौशल्या के पास पहुंचे। कौशल्या ने उन्हें समझाया कि होनी को कोई नहीं टाल सकता। गुरु वशिष्ठ ने भी भरत को समझाते हुए कहा कि हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सब विधि के हाथ में है, इसलिए किसी को दोष देना उचित नहीं। उन्होंने भरत को राजसिंहासन संभालने की सलाह दी, लेकिन भरत ने इसे स्वीकार करने से स्पष्ट इनकार कर दिया।

भरत ने संकल्प लिया कि वे श्रीराम को मनाकर अयोध्या वापस लाएंगे। इसके बाद वे परिजनों और बड़ी संख्या में लोगों के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े। श्रीराम के राजतिलक के लिए चतुरंगिणी सेना के साथ चारों तीर्थों का जल भी साथ लिया गया।

भरत की सेना को आते देख निषादराज को पहले आशंका हुई। उन्होंने सेवक से अपना धनुष-बाण मंगवाया। लेकिन भरत से भेंट होने के बाद उनका भ्रम दूर हो गया। गुरु वशिष्ठ ने निषादराज के बारे में भरत को बताया कि वे श्रीराम के मित्र हैं। भरत रथ से उतरकर निषादराज से मिले।

निषादराज भरत सहित सभी को गंगा तट पर ले गए। गंगा दर्शन और प्रणाम के बाद उन्होंने भरत को ढांढस बंधाया। इसके बाद भरत गंगा पार कर उस मार्ग पर आगे बढ़े, जिस रास्ते से श्रीराम वन की ओर गए थे। राम के चरण पड़े मार्ग पर बढ़ते हुए भरत बार-बार सिर नवाते रहे।

आखिरकार सभी लोग भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे। वहां भोजन के बाद सभी ने विश्राम किया। इसी स्थान पर आरती के साथ इस प्रसंग का समापन हुआ। रामनगर की रामलीला में भरत के चरित्र के माध्यम से भाई के प्रति प्रेम, त्याग, मर्यादा और धर्मनिष्ठा का भावपूर्ण संदेश देखने को मिला।


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