वाराणसी। वाराणसी के करौली डायग्नोस्टिक्स सेंटर पर एक डॉक्टर के नाम और डिजिटल हस्ताक्षर का कथित रूप से इस्तेमाल कर जांच रिपोर्ट जारी करने का मामला सामने आया है। मामले में अधिवक्ता अजय उपाध्याय की शिकायत के आधार पर लंका थाने में जालसाजी, कूटरचना और धोखाधड़ी से संबंधित धाराओं में FIR दर्ज कराई गई है। हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक वेब स्रोतों में इस मामले की स्वतंत्र पुष्टि सीमित मिली है, इसलिए आरोपों को जांच का विषय माना जाना चाहिए।
शिकायत के मुताबिक, अपोलो हॉस्पिटल के पूर्व वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ. एस. सेंथिल कुमार पिछले करीब दो वर्षों से भारत में नहीं हैं और विदेश में रह रहे हैं। आरोप है कि भारत छोड़ने से पहले डॉक्टर की ओर से वाराणसी के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय को लिखित रूप से यह जानकारी दी गई थी कि वह वाराणसी के किसी डायग्नोस्टिक सेंटर से जुड़े नहीं हैं।
इसके बावजूद शिकायतकर्ता का आरोप है कि करौली डायग्नोस्टिक्स में इस्तेमाल किए जा रहे कंप्यूटर सिस्टम और सॉफ्टवेयर के माध्यम से डॉक्टर के डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल कर मरीजों की जांच रिपोर्ट जारी की जाती रही।
शिकायत में स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि डॉक्टर की ओर से दी गई लिखित सूचना के बावजूद उनके नाम से रिपोर्ट जारी होने का सिलसिला नहीं रुका।
मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए यह जांच जरूरी होगी कि संबंधित रिपोर्टें कब और किस सिस्टम से तैयार हुईं, डिजिटल हस्ताक्षर किसके लॉगिन से इस्तेमाल हुए और संबंधित डॉक्टर की उस अवधि में डायग्नोस्टिक सेंटर से कोई वैध संबद्धता थी या नहीं।
यदि जांच के दौरान डॉक्टर के नाम और डिजिटल हस्ताक्षर का अनधिकृत इस्तेमाल साबित होता है तो मामला केवल दस्तावेजी अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे उन मरीजों की रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ सकते हैं, जिन्हें संबंधित रिपोर्टें जारी की गई थीं।
ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने यह भी महत्वपूर्ण सवाल होगा कि कितनी रिपोर्टें जारी हुईं, उनमें किन जांचों के परिणाम शामिल थे और क्या किसी मरीज के इलाज पर इन रिपोर्टों का प्रभाव पड़ा।
मामले में अब पुलिस जांच के साथ स्वास्थ्य विभाग की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। जांच में यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि करौली डायग्नोस्टिक्स के पास संबंधित डॉक्टर की सेवाएं लेने की कोई वैध अनुमति या अनुबंध था या नहीं।
साथ ही डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम, डॉक्टर के लॉगिन/हस्ताक्षर, रिपोर्ट तैयार करने वाले कर्मचारियों और संबंधित रिकॉर्ड की तकनीकी जांच से आरोपों की वास्तविकता सामने आ सकती है।
शिकायत में डायग्नोस्टिक सेंटरों और चिकित्सकों के बीच कथित कमीशन व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, किसी विशेष डॉक्टर या सेंटर द्वारा कमीशन लेने अथवा देने की बात बिना दस्तावेजी या जांच संबंधी पुष्टि के तथ्य के रूप में नहीं कही जा सकती।
यदि जांच एजेंसियों को इस मामले में आर्थिक लेनदेन से जुड़े साक्ष्य मिलते हैं, तो उनकी भी अलग से जांच की जा सकती है।
लंका थाने में FIR दर्ज होने के बाद अब पुलिस जांच में यह तय होना है कि डॉक्टर के डिजिटल हस्ताक्षर का इस्तेमाल किसने किया, रिपोर्टें किसके निर्देश पर जारी हुईं और इसमें सेंटर से जुड़े किन लोगों की भूमिका रही।
फिलहाल मामले में लगाए गए आरोपों की पुष्टि न्यायिक या पुलिस जांच के निष्कर्ष आने के बाद ही हो सकेगी। करौली डायग्नोस्टिक्स या संबंधित अन्य पक्षों का जवाब उपलब्ध होने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना आवश्यक होगा।
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