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Ramnagar Ki Ramlila | बिना पांव पखारे केवट ने प्रभु राम को नाव पर बैठाने से किया इनकार



 04/Oct/26

अहिल्या की कथा सुनकर था डर, कहीं प्रभु के चरण पड़ते ही नाव भी स्त्री न बन जाए

वाराणसी। वनगमन के दौरान प्रभु श्रीराम के गंगा पार करने और केवट से हुए संवाद का भावपूर्ण प्रसंग रामलीला के दसवें दिन मंचित किया गया। केवट ने प्रभु श्रीराम को बिना चरण पखारे नाव पर बैठाने से साफ इनकार कर दिया। उसके मन में यह भय था कि कहीं प्रभु के चरण पड़ते ही उसकी नाव भी अहिल्या की तरह स्त्री न बन जाए।

रामलीला में दिखाया गया कि वन की ओर बढ़ते हुए श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण गंगा तट पर पहुंचे। प्रभु ने केवट से नाव लाकर उन्हें गंगा पार कराने के लिए कहा। केवट ने प्रभु के चरणों की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि वह पहले उनके पांव पखारेगा, तभी उन्हें नाव पर बैठाएगा। उसका तर्क था कि उसने सुन रखा है कि प्रभु के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ था। ऐसे में यदि प्रभु का पैर नाव पर पड़ गया तो कहीं उसकी नाव भी स्त्री न बन जाए।

केवट की भक्ति और सरल भाव सुनकर प्रभु श्रीराम माता सीता की ओर देखकर मुस्कुराए और उसे चरण पखारने की अनुमति दे दी। केवट कठौते में गंगाजल लेकर आया और प्रभु के चरण पखारे। इसके बाद चरणामृत ग्रहण कर उसने श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को नाव पर बैठाया और गंगा के पार पहुंचाया। इस दौरान देवताओं द्वारा जय-जयकार किए जाने का दृश्य भी मंचित हुआ।

गंगा पार पहुंचने के बाद प्रभु श्रीराम ने केवट को उतराई के रूप में मुद्रिका देने का प्रयास किया, लेकिन केवट ने उसे लेने से विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। उसने कहा कि प्रभु जब वापस लौटेंगे, तब जो कुछ देंगे, उसे वह प्रसाद समझकर स्वीकार करेगा।

इसके बाद श्रीराम निषादराज से घर वापस जाने के लिए कहते हैं। निषादराज ने प्रभु से चार दिन और सेवा का अवसर देने का आग्रह किया। इसके बाद श्रीराम सभी को साथ लेकर प्रयाग पहुंचे और त्रिवेणी में स्नान किया। वहां से वे भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचे, जहां रात्रि विश्राम के बाद प्रातः वन की ओर आगे बढ़ने का मार्ग पूछा।

मुनि के शिष्य उन्हें यमुना के तट तक पहुंचाते हैं। यमुना पार करने के बाद श्रीराम ग्रामवासियों से मिले। इसी दौरान लक्ष्मण ने महर्षि वाल्मीकि के आश्रम का पता पूछा। वाल्मीकि आश्रम पहुंचने पर श्रीराम के दर्शन से महर्षि स्वयं को धन्य मानते हैं।

श्रीराम ने महर्षि वाल्मीकि को वन में आने का कारण बताते हुए निवास के लिए उपयुक्त स्थान बताने का अनुरोध किया। महर्षि ने उन्हें सभी ऋतुओं में सुखदायक चित्रकूट पर्वत पर निवास करने की सलाह दी। इसके बाद राम चित्रकूट की ओर प्रस्थान करते हैं।

चित्रकूट पहुंचने पर कोल और भील सहित वनवासी समुदाय प्रभु श्रीराम की सहायता के लिए पहुंचते हैं। विश्वकर्मा के साथ मिलकर सुंदर कुटिया का निर्माण किए जाने का प्रसंग भी लीला में प्रस्तुत किया गया। प्रभु श्रीराम की जय-जयकार के बीच आरती हुई और इसके साथ रामलीला के दसवें दिन की लीला को विश्राम दिया गया।


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