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निषादराज आश्रम क्या अब इतिहास के पन्नों में ही सिमट कर रह जाएगा?



 03/Oct/26

रामनगर रामलीला के मूल स्थल पर पानी-कीचड़ का संकट, लीला स्थल बदलने से रामायणियों और लीला प्रेमियों में चिंता

रामनगर। रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जीवंत परंपरा और सांस्कृतिक विरासत है। रामलीला के जिन पारंपरिक स्थलों पर वर्षों से विभिन्न प्रसंगों का मंचन होता आया है, उन्हें हेरिटेज जोन में शामिल किए जाने के बावजूद इन स्थलों की स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। ताजा मामला निषादराज आश्रम का है, जहां दुर्व्यवस्था के कारण एक बार फिर मूल लीला स्थल पर मंचन नहीं हो सका।

पिछले करीब पांच वर्षों से निषादराज आश्रम के पारंपरिक लीला स्थल पर जलभराव और कीचड़ की समस्या बनी हुई है। इसके चलते रामलीला मूल स्थल पर कराने के बजाय आसपास की सड़क और गली में करनी पड़ रही है। इस बार भी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं दिखाई दिया। जिस स्थान पर पारंपरिक रूप से निषादराज मिलन की लीला होती रही है, वहां पानी और कीचड़ जमा होने के कारण लीला स्थल बदलना पड़ा।

शनिवार को रामलीला अयोध्या से चलकर निषादराज आश्रम पहुंची, लेकिन मूल स्थल की स्थिति खराब होने के कारण आश्रम गली में ही बनाया गया। इसी स्थान पर लीला और आरती कराई गई। इससे पहले ताड़का वध की लीला का स्थल भी दुर्व्यवस्था के चलते बदले जाने की बात सामने आई थी। लगातार लीला स्थलों में बदलाव को लेकर रामायणियों और लीला प्रेमियों में चिंता और नाराजगी देखी जा रही है।

मिट्टी पाटकर मकान बनने से नीचे हुआ पारंपरिक लीला स्थल

स्थानीय लोगों के अनुसार, पारंपरिक लीला स्थल के आसपास समय के साथ मिट्टी पाटकर मकान बना दिए गए। इसके कारण मूल लीला स्थल आसपास की जमीन की तुलना में काफी नीचे हो गया। बरसात के मौसम में पानी यहां जमा हो जाता है और कई बार स्थिति स्थायी तालाब जैसी हो जाती है। बारिश रुकने के बाद भी कीचड़ की समस्या बनी रहती है।

स्थानीय लोगों की ओर से लीला स्थल की भूमि पर अतिक्रमण और उसके हिस्सों के बेचे जाने के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है। सवाल यह है कि यदि यह स्थान वास्तव में ऐतिहासिक और पारंपरिक लीला स्थल है, तो इसके संरक्षण और सीमांकन की जिम्मेदारी किसकी है?

रामलीला के समय ही क्यों जागता है प्रशासन?

रामनगर की रामलीला आमतौर पर ऐसे मौसम में होती है, जब बारिश की संभावना बनी रहती है। बरसात के कारण कई बार लीला स्थगित तक करनी पड़ती रही है, लेकिन लीला प्रेमियों के मुताबिक परंपरागत रूप से लीला स्थल बदलने की नौबत नहीं आती थी।

उनका कहना है कि अब लीला शुरू होने के समय प्रशासनिक स्तर पर व्यवस्थाएं सक्रिय होती हैं, जबकि लीला स्थलों की स्थायी समस्या का समाधान पूरे वर्ष किया जाना चाहिए। उनका सवाल है कि जब रामलीला के प्रमुख स्थलों को हेरिटेज जोन में शामिल किया गया है तो उनके संरक्षण, जलनिकासी और अतिक्रमण की स्थिति की नियमित निगरानी क्यों नहीं हो रही?

रामनगर दुर्ग प्रशासन की भूमिका पर भी उठे सवाल

निषादराज आश्रम से जुड़ी मौजूदा स्थिति को लेकर रामलीला प्रेमियों के बीच रामनगर दुर्ग प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उनका कहना है कि रामनगर की रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा को बनाए रखने के लिए केवल आयोजन के समय अस्थायी व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। लीला स्थलों का संरक्षण और उनकी मूल संरचना को सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है।

ढाई सौ साल पुरानी परंपरा के भविष्य पर सवाल

रामनगर की रामलीला की पहचान उसके पारंपरिक लीला स्थलों से भी जुड़ी हुई है। ऐसे में यदि लगातार मूल स्थलों की जगह सड़क, गली या दूसरे स्थानों पर लीला करानी पड़े तो इसका असर भविष्य में रामलीला के पारंपरिक स्वरूप पर पड़ सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि ढाई सौ साल पुराने बताए जाने वाले निषादराज आश्रम और अन्य पारंपरिक लीला स्थलों का संरक्षण कौन करेगा? क्या हेरिटेज जोन में शामिल किए गए इन स्थलों की स्थिति इसी तरह बनी रहेगी? यदि लीला स्थल लगातार बदले जाते रहे तो रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला के पारंपरिक स्वरूप में आने वाले बदलाव की जिम्मेदारी कौन लेगा?

रामनगर के लीला प्रेमियों की अपेक्षा है कि प्रशासन, रामनगर दुर्ग प्रशासन और संबंधित विभाग इस मामले को केवल रामलीला के दिनों की व्यवस्था के रूप में न देखकर स्थायी संरक्षण और मूल लीला स्थलों की सुरक्षा के सवाल के रूप में देखें।

क्या निषादराज आश्रम अपनी परंपरागत पहचान के साथ सुरक्षित रह पाएगा, या फिर आने वाली पीढ़ियां इसे केवल इतिहास के पन्नों में ही खोजेंगी—यह सवाल अब रामनगर के सामने है।


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