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का हो, प्रभु के बारात में चलत हउवा न... रामनगर में राम विवाह की लीला ने बांधा भावनाओं का सेतु



 03/Oct/26

रामनगर। रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला अपनी भव्यता और परंपराओं के साथ-साथ लोगों के आत्मिक और भावनात्मक जुड़ाव के लिए भी जानी जाती है। यहां रामलीला का हर प्रसंग केवल मंचन नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं के लिए ऐसा अनुभव बन जाता है, जिसमें वे स्वयं त्रेता युग का हिस्सा महसूस करने लगते हैं। बुधवार को प्रभु श्रीराम की बारात निकली तो रामनगर का पूरा माहौल ही बारातमय हो गया।

सबसे खास बात यह रही कि प्रभु श्रीराम की बारात में शामिल होने के लिए किसी को औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया गया था। इसके बावजूद हजारों की संख्या में लीला प्रेमी बाराती बनकर उमड़ पड़े। नित्य लीला देखने वाले श्रद्धालु तो इस अवसर के लिए विशेष तैयारी करके पहुंचे थे। नए कपड़े, विशेष इत्र और माथे पर चंदन का तिलक लगाए लोग एक-दूसरे से बड़े अपनत्व के साथ पूछते नजर आए—“का हो, प्रभु के बारात में चलत हउवा न?”

किसी राहगीर को इत्र लगाने के बाद उसे बारात में शामिल होने का न्योता देना और कहना—“चला, ई मौका जीवन में फिर न मिली”—रामनगर की उस जीवंत परंपरा का हिस्सा बन गया, जिसमें लीला और आम जनजीवन के बीच की दूरी मिट जाती है। देखते ही देखते पूरा रामनगर बाराती बन गया।

राम विवाह की लीला में आम हिन्दू परिवारों में होने वाली विवाह की पारंपरिक रस्मों का भी जीवंत चित्रण देखने को मिला। जनकपुर से कुछ दूरी पर जनवासा बनाया गया था। दूल्हे के रूप में मउर धारण किए प्रभु श्रीराम और चारों भाई बैंड-बाजे के साथ घोड़ों पर सवार होकर जनकपुर पहुंचे। वहां पहुंचने पर द्वार परंपरा के अनुसार परिछन, द्वारपूजा सहित विवाह से जुड़ी रस्में निभाई गईं।

इस दौरान लीला स्थल पर मौजूद श्रद्धालु इस अद्भुत दृश्य के साक्षी बने रहे। उनके लिए यह केवल राम विवाह का मंचन नहीं, बल्कि प्रभु श्रीराम के जीवन चरित्र को अपनी आंखों के सामने घटित होते देखने जैसा अनुभव था।

रामनगर की रामलीला की यही विशेषता उसे अन्य आयोजनों से अलग बनाती है। यहां पात्र और दर्शक के बीच की सीमा कई बार पूरी तरह समाप्त होती दिखाई देती है। लोग केवल लीला देखते नहीं, बल्कि उसके भाव में स्वयं को शामिल कर लेते हैं। प्रभु श्रीराम की बारात में उमड़ा जनसैलाब इसी आत्मिक जुड़ाव की झलक था।

लीला प्रेमियों के लिए बुधवार की रात का यह दृश्य लंबे समय तक याद रहने वाला बन गया। ब्रह्म और माया के मिलन की इस लीला का ऐसा प्रत्यक्ष और भावपूर्ण साक्षात्कार रामनगर की रामलीला की विशिष्ट परंपरा में ही देखने को मिलता है।


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