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महारानी के एक ताने से शुरू हुई रामनगर की रामलीला, ढाई सौ साल बाद भी कायम है परंपरा



 27/Sep/26

रामचरितमानस के अनुसार होता है मंचन, न लाउडस्पीकर की आवाज न आधुनिक चकाचौंध; पेट्रोमैक्स की रोशनी में निभाए जाते हैं प्रसंग
‘चुप रहो... सावधान!’ रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में करीब एक महीने तक यह चेतावनी लगातार सुनाई देती है। लीला देखने उमड़ने वाली भीड़ को शांत रखने के लिए दी जाने वाली यह आवाज इस परंपरा के पुराने स्वरूप का हिस्सा मानी जाती है। आधुनिक समय में जब मंचन की शैली बदल रही है, वहीं रामनगर की रामलीला आज भी अपनी पारंपरिक शैली, निर्धारित लीला स्थलों और अनुशासन के लिए अलग पहचान रखती है।

रामनगर की रामलीला कब शुरू हुई, इसे लेकर इतिहास और लोककथाओं में अलग-अलग बातें मिलती हैं। पुराने दस्तावेजों के हवाले से इसका आरंभ काशीराज परिवार के महाराजा उदित नारायण सिंह के शासनकाल 1794 से 1835 के बीच माना जाता है। हालांकि इसकी शुरुआत से जुड़ी कई किंवदंतियां भी प्रचलित हैं।

महारानी के ताने से जुड़ी है सबसे चर्चित कहानी

रामनगर की रामलीला शुरू होने की सबसे चर्चित लोककथा महाराजा उदित नारायण सिंह और उनकी महारानी से जुड़ी है। बताया जाता है कि मिर्जापुर के बरईपुर में भोनू और विट्ठल साहू नामक दो व्यापारी प्रतिवर्ष रामलीला कराते थे और महाराजा को भी उसमें आमंत्रित किया जाता था।

एक बार धनुष यज्ञ की लीला के दिन महाराजा कुछ देर से पहुंचे। उनके आने से पहले ही आयोजकों ने लीला शुरू करा दी और श्रीराम की भूमिका निभा रहे पात्र से धनुष तुड़वा दिया। यह जानकारी रास्ते में मिलने पर महाराजा कथित तौर पर लीला में गए बिना रामनगर लौट आए। इस घटना से वे काफी दुखी हुए।

कहा जाता है कि कई दिनों तक महाराजा को उदास देखकर महारानी ने कारण पूछा। महाराजा ने पूरी घटना बताई तो महारानी ने ताना देते हुए कहा कि जब एक साधारण व्यापारी रामलीला करा सकता है तो महाराजा ऐसा आयोजन क्यों नहीं करा सकते। लोककथा के अनुसार महारानी की यही बात महाराजा के मन में बैठ गई और उन्होंने रामनगर में रामलीला शुरू कराने का निर्णय लिया।

दुर्ग से बाहर निकली लीला, 1835 के बाद हुआ विस्तार

कहा जाता है कि शुरुआती दौर में रामलीला दुर्ग परिसर में ही आयोजित होती थी। वर्ष 1835 के बाद महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह के शासनकाल में इसका विस्तार हुआ। वर्तमान लीला स्थलों का निर्धारण उनके गुरु काष्ठजिह्वा स्वामी के मार्गदर्शन में किए जाने की बात कही जाती है।

रामचरितमानस के प्रसंगों के अनुरूप अलग-अलग लीला स्थलों का निर्माण कराया गया और संवादों को हिंदी-अवधी शैली में तैयार किया गया। इसके बाद रामनगर की रामलीला धीरे-धीरे अपने वर्तमान विस्तृत स्वरूप में विकसित हुई।

धन की कमी में ‘भौजी साहिबा’ ने दान की संपत्ति

रामलीला के विस्तार के लिए धन की कमी से जुड़ी एक और कथा भी प्रचलित है। बताया जाता है कि महाराजा ईश्वरी नारायण सिंह के भाई बाबू नर नारायण सिंह की बहूरानी, जिन्हें ‘भौजी साहिबा’ के नाम से जाना जाता था, ने रामलीला के लिए अपनी संपत्ति समर्पित कर दी थी।

कहा जाता है कि उनका मायका बिहार के बेतिया में था और दहेज में मिली धनकुटवा क्षेत्र की संपत्ति उन्होंने रामलीला के लिए दे दी। वहां से होने वाली आय रामलीला के आयोजन में खर्च की जाती थी। बाद में इस क्षेत्र को बेचकर प्राप्त धनराशि बैंक में जमा किए जाने और उसके ब्याज से रामलीला के आयोजन की परंपरा चलने की भी जानकारी मिलती है। हालांकि इस विवरण के अलग-अलग संस्करण प्रचलित हैं।

रामचरितमानस का अक्षरशः पालन

रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी विशेषताओं में रामचरितमानस के प्रसंगों का पारंपरिक रूप में मंचन शामिल है। पात्रों के चयन से लेकर उनकी वेशभूषा और लीला स्थलों तक में परंपरा का विशेष ध्यान रखा जाता है।

इस रामलीला की एक खास बात यह भी है कि लीला क्षेत्र में लाउडस्पीकर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पेट्रोमैक्स की रोशनी में लीला का मंचन होता है। आधुनिक चकाचौंध से अलग यह व्यवस्था रामनगर की रामलीला को अपनी विशिष्ट पहचान देती है।

मुस्लिम परिवार निभाता है महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

रामनगर की रामलीला में गंगा-जमुनी तहजीब की झलक भी दिखाई देती है। लीला में इस्तेमाल होने वाले पुतलों, मशाल और मोहताबी से जुड़े काम लंबे समय से एक मुस्लिम परिवार का घराना करता आ रहा है। अलग-अलग भूमिकाओं और व्यवस्थाओं में करीब 150 से 200 कामगार जुड़े होने की बात बताई जाती है।

लीला से जुड़े विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग लोगों की जिम्मेदारी तय रहती है। यही व्यवस्था लंबे समय से आयोजन के संचालन का हिस्सा बनी हुई है।

श्रृंगार कर लीला देखने पहुंचते हैं श्रद्धालु

रामनगर की रामलीला केवल मंचन नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा के रूप में देखी जाती है। नियमित रूप से लीला देखने आने वाले कई पुरुष श्रद्धालु पूरे श्रृंगार के साथ पहुंचते हैं। उनके कंधे पर झोला होता है, जिसमें स्नान, पूजा और श्रृंगार से जुड़ी आवश्यक वस्तुएं रहती हैं।

देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले लीला प्रेमियों के साथ बड़ी संख्या में बनारस और आसपास के लोग भी यहां पहुंचते हैं।

बदलते समय में बदल रही रामलीला की तस्वीर

समय के साथ रामनगर की रामलीला के स्वरूप में भी बदलाव दिखाई देने लगा है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण का असर लीला क्षेत्र पर पड़ रहा है। परंपरागत लीला स्थलों और उनके आसपास बढ़ता निर्माण इस सांस्कृतिक विरासत को लेकर चिंता का विषय माना जा रहा है।

पुराने समय में बड़ी संख्या में नागा साधु और संन्यासी रामलीला देखने पहुंचते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार 1970 के दशक तक उनकी मौजूदगी लीला की विशेष पहचान थी, लेकिन अब उनकी संख्या काफी कम हो गई है।

इसी तरह कभी रामलीला में दर्जनों हाथियों का नक्काशीदार हौदों वाला काफिला दिखाई देता था। अब यह संख्या घटकर दो-तीन हाथियों तक सीमित रह गई है।

मोहताज खाना में आज भी चलता है अन्न वितरण

रामनगर की रामलीला से जुड़ी एक पुरानी परंपरा मोहताज खाना भी है। यहां रामलीला के दौरान आने वाले साधु-संतों और जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराने की परंपरा बताई जाती है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यह व्यवस्था रामलीला के पुराने दौर से चली आ रही है।

रामलीला के आयोजन में बड़ी राशि खर्च होने की बात भी आयोजनों से जुड़े लोगों की ओर से कही जाती है। वहीं सरकारी अनुदान को लेकर भी पर्याप्तता पर सवाल उठते रहे हैं।

करीब ढाई सौ साल से चली आ रही रामनगर की रामलीला आज भी अपनी पारंपरिक शैली, लोक आस्था और सांस्कृतिक विरासत को संभाले हुए है। समय के साथ चुनौतियां बढ़ी हैं, लेकिन ‘चुप रहो... सावधान’ की आवाज, पेट्रोमैक्स की रोशनी और निर्धारित लीला स्थलों में होने वाला मंचन आज भी इस ऐतिहासिक परंपरा की पहचान बना हुआ है।


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