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विश्व विख्यात रामनगर की लीला में विश्वामित्र संग मिथिला चले श्रीराम-लक्ष्मण, ताड़का-सुबाहु वध के बाद अहिल्या को मिली मुक्ति



 27/Sep/26

रामनगर। विश्व की अनूठी और अपनी परंपरा एवं जीवंत मंचन शैली के लिए प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में रविवार को तीसरे दिन की लीला का मंचन हुआ। अयोध्या से जनकपुर की ओर बढ़ती रामलीला में इस दिन भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के मुनि विश्वामित्र के साथ मिथिला प्रस्थान से लेकर ताड़का और सुबाहु के वध तथा अहिल्या उद्धार तक के प्रसंगों को सजीव किया गया। लीला के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीराम के उन चरणों का दर्शन किया, जिनके स्पर्श मात्र से शापग्रस्त अहिल्या को मुक्ति मिल गई।

राजा दशरथ को उस समय क्या पता था कि उनके लाड़ले श्रीराम केवल अयोध्या के राजकुमार नहीं, बल्कि धरती पर लोककल्याण के लिए अवतरित हुए हैं। जब राक्षसों के आतंक से त्रस्त मुनि विश्वामित्र संत समाज और अपने यज्ञ की रक्षा के लिए राजा दशरथ के दरबार में पहुंचे और श्रीराम तथा लक्ष्मण को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया, तो दशरथ चिंतित हो उठे। उन्होंने अपने दोनों पुत्रों को सुकुमार बताते हुए राक्षसों से युद्ध के लिए भेजने में संकोच व्यक्त किया।

विश्वामित्र के आग्रह पर राजा दशरथ पहले तो असमंजस में रहे, लेकिन गुरु वशिष्ठ के समझाने के बाद उन्होंने दोनों पुत्रों को मुनि के साथ भेजने की अनुमति दे दी। इसके बाद श्रीराम और लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के साथ अयोध्या से मिथिला की ओर चल पड़े। यह यात्रा केवल जनकपुर तक पहुंचने की यात्रा नहीं थी, बल्कि इसी मार्ग में ऐसे प्रसंग घटने वाले थे, जो रामकथा को आगे निर्णायक मोड़ देने वाले थे।

मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करते हुए श्रीराम और लक्ष्मण ने राक्षसों के आतंक का अंत किया। यज्ञ में विघ्न डालने पहुंची ताड़का और सुबाहु का श्रीराम ने युद्ध में वध कर दिया। राक्षसों के संहार के बाद मुनि विश्वामित्र की चिंता दूर हुई और देवताओं ने भी श्रीराम की जय-जयकार की।

इसके बाद दोनों भाई आगे बढ़े। मार्ग में एक आश्रम और वहां पड़ी एक शिला को देखकर श्रीराम और लक्ष्मण ने मुनि विश्वामित्र से उसके बारे में पूछा। तब उन्हें ज्ञात हुआ कि वह शिला कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि गौतम मुनि की पत्नी अहिल्या थीं, जो श्राप के कारण शिला रूप में परिवर्तित हो गई थीं।

मुनि विश्वामित्र के कहने पर श्रीराम ने अपने चरणों से उस शिला का स्पर्श किया। चरण स्पर्श होते ही अहिल्या अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हो गईं। मुक्ति मिलते ही अहिल्या भगवान श्रीराम के चरणों में गिर पड़ीं और उनके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। इस भावपूर्ण प्रसंग ने रामलीला स्थल पर मौजूद श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। इसके बाद अहिल्या स्वर्गलोक को चली गईं।

अहिल्या को मुक्ति देने के बाद श्रीराम और लक्ष्मण मुनि विश्वामित्र के साथ आगे बढ़े। मार्ग में दोनों भाइयों ने गंगा के दर्शन किए और इसके बाद मिथिला की सीमा के समीप पहुंचे। मुनि विश्वामित्र ने वहीं रुकने की इच्छा व्यक्त की। उनके जनकपुर के समीप पहुंचने की सूचना जब राजा जनक को मिली तो वे स्वयं वहां पहुंचे।

राजा जनक ने मुनि विश्वामित्र से उनके साथ आए दोनों राजकुमारों का परिचय पूछा। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि ये अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम और लक्ष्मण हैं, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए और मुनि विश्वामित्र के साथ दोनों भाइयों को आदरपूर्वक जनकपुर ले गए।

जनकपुर पहुंचने पर श्रीराम और लक्ष्मण का विधिवत सेवा-सत्कार किया गया। मुनि विश्वामित्र के साथ भोजन करने के बाद सभी ने विश्राम किया। आरती के साथ तीसरे दिन की लीला को विश्राम दिया गया।

रामनगर की इस परंपरागत रामलीला में कथा के प्रत्येक प्रसंग के साथ लोक और धर्म की वह भावभूमि भी दिखाई देती है, जिसमें भगवान श्रीराम का जीवन केवल एक राजकुमार की यात्रा नहीं, बल्कि लोककल्याण, धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश की कथा के रूप में सामने आता है। तीसरे दिन की लीला में ताड़का-सुबाहु वध से जहां अधर्म के अंत का संदेश दिखाई दिया, वहीं अहिल्या उद्धार के प्रसंग ने भगवान के करुणामय और उद्धारकारी स्वरूप को सामने रखा।


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