नई दिल्ली। लद्दाख से जुड़े मुद्दों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर रहे शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन के बीच सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है। लेखक बंशीलाल परमार की इस पोस्ट में मणिपुर की चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला का उदाहरण देते हुए समाज के रवैये पर सवाल उठाए गए हैं।
पोस्ट में लिखा गया है कि इरोम शर्मिला ने अपने लोगों के अधिकारों के लिए 16 वर्षों तक अनशन किया। उन्हें देश-दुनिया में "आयरन लेडी ऑफ मणिपुर" के नाम से पहचान मिली। लेकिन जब उन्होंने आंदोलन छोड़कर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ने का फैसला किया, तब उन्हें केवल 90 वोट मिले। इस घटना को लेखक समाज की बेरुखी का प्रतीक बताते हैं।
इसी संदर्भ में पोस्ट में सोनम वांगचुक के संघर्ष का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया गया है कि आखिर वे किन लोगों के लिए अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं? लेखक का कहना है कि समाज किसी के संघर्ष पर फिल्म बनाकर या उसकी कहानी से प्रेरणा लेकर तालियां तो बजा सकता है, लेकिन वास्तविक संघर्ष के समय अक्सर वही समाज चुप दिखाई देता है।
यह पोस्ट किसी राजनीतिक दल या पक्ष का समर्थन या विरोध नहीं करती, बल्कि समाज के दोहरे रवैये और जनभागीदारी पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
सोनम वांगचुक के आंदोलन में नया घटनाक्रम
इस बीच सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन लगातार जारी है। उनकी सेहत को लेकर चिंता बढ़ने पर दिल्ली हाई कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर केंद्र और दिल्ली सरकार से जवाब मांगा है। अदालत ने उनकी स्वास्थ्य स्थिति पर गंभीरता दिखाई है।
वहीं, आंदोलन को समर्थन देने के लिए विभिन्न सामाजिक संगठनों ने एकजुटता दिखाई है। प्रदर्शनकारियों ने संसद मार्च और व्यापक जनसमर्थन की अपील भी की है। सोनम वांगचुक ने लोगों से कहा है कि केवल सोशल मीडिया पर समर्थन देने के बजाय नागरिक के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए आंदोलन में भागीदारी करें।
सोशल मीडिया पर बहस
वायरल पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक वर्ग इसे समाज की संवेदनहीनता पर सटीक टिप्पणी बता रहा है, जबकि दूसरा वर्ग इसे अत्यधिक निराशावादी दृष्टिकोण मान रहा है। हालांकि, इतना तय है कि इस पोस्ट ने संघर्ष, जनसमर्थन और सामाजिक जिम्मेदारी को लेकर नई बहस छेड़ दी है।