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बहुचर्चित 10 साल पुराने दहेज हत्या केस में बड़ा फैसला: अधिवक्ता अवनीश त्रिपाठी की पैरवी पर पति-देवर को मिली क्लीन चिट



 15/May/26

वाराणसी। करीब दस वर्षों से चर्चाओं में रहे दहेज हत्या के बहुचर्चित मामले में आखिरकार अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए अभियुक्त हरिश्चन्द्र वर्मा और सुशील वर्मा को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अपर सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या-1 वाराणसी संध्या श्रीवास्तव की अदालत ने यह फैसला सत्र परीक्षण संख्या 538/2016, थाना चौबेपुर के मुकदमा अपराध संख्या 300/2016 में सुनाया। बचाव पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश त्रिपाठी बब्बू ने प्रभावी पैरवी की।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतका पूनम वर्मा को दहेज और पुत्र की चाह को लेकर प्रताड़ित किया जाता था तथा उसकी हत्या कर साक्ष्य मिटाने के उद्देश्य से बिना मायके पक्ष को सूचना दिए अंतिम संस्कार कर दिया गया। इसी आरोप के आधार पर पुलिस ने हरिश्चन्द्र वर्मा और सुशील वर्मा के खिलाफ धारा 302 एवं 201 आईपीसी के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में पेश गवाहों के बयान अभियोजन की कहानी को मजबूत नहीं कर सके। वादी इन्द्रसेन वर्मा ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उनकी पुत्री पहले से अस्थमा और हृदय रोग से पीड़ित थी। उन्होंने यह भी कहा कि दामाद ने कभी दहेज की मांग नहीं की और वह स्वयं मृतका के दाह संस्कार में शामिल हुए थे।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता अवनीश त्रिपाठी बब्बू ने जोरदार ढंग से पक्ष रखते हुए अदालत को बताया कि पूरे मामले में हत्या का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य, स्पष्ट कारण या विश्वसनीय गवाही मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी तर्क रखा कि केवल आशंका और आरोपों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष हत्या का तरीका, प्रयुक्त साधन, स्पष्ट हेतुक और साक्ष्य मिटाने के आरोप को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा। न्यायालय ने माना कि केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि संभव नहीं है।

इसी आधार पर अदालत ने दोनों अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया। साथ ही अदालत ने अभियुक्तों के जमानत बंधपत्र निरस्त करते हुए धारा 437ए दंड प्रक्रिया संहिता के तहत आवश्यक बंधपत्र दाखिल करने का आदेश दिया।

 


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