मुख्य वक्ता Avadhesh Pradhan ने कहा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर केवल साहित्यकार नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतिनिधि चिंतक थे। उन्होंने बताया कि ठाकुर का साहित्य भारतीय जीवन-दृष्टि, प्रकृति-सौंदर्य, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय करुणा का व्यापक दस्तावेज है।
उन्होंने कहा कि Gitanjali के लिए वर्ष 1913 में मिला नोबेल पुरस्कार भारतीय ज्ञान-परंपरा की वैश्विक पहचान का प्रतीक था। अमेरिकी कवि Ezra Pound के कथन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि रवीन्द्रनाथ का साहित्य विश्वमानवता और शाश्वत मूल्यों का वाहक है।
व्याख्यान में यह भी बताया गया कि Rabindranath Tagore पर John Keats और Percy Bysshe Shelley जैसे रोमांटिक कवियों का प्रभाव दिखता है, लेकिन उनकी जड़ें भारतीय ज्ञान-परंपरा में गहराई से जुड़ी थीं। साथ ही Swami Vivekananda के वैदिक और उपनिषदिक विचारों का प्रभाव भी उनके साहित्य में परिलक्षित होता है।
रवीन्द्रनाथ के ‘भारतबोध’ पर चर्चा करते हुए बताया गया कि उनके चिंतन में भारतीय लोकजीवन, उपनिषदों की आध्यात्मिकता और आधुनिक मानवीय मूल्यों का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने शिक्षा को केवल रोजगार नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन और संवेदनशीलता के विकास का माध्यम माना। इसी दृष्टि से उन्होंने Visva-Bharati University की स्थापना की।
कार्यक्रम में रवीन्द्र संगीत की सांस्कृतिक भूमिका पर भी विस्तार से चर्चा हुई। बताया गया कि उनके लगभग 2200 गीत भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति हैं, जिनमें शास्त्रीय संगीत, लोकधारा और पाश्चात्य प्रभावों का समन्वय दिखाई देता है। “जन गण मन”, “आमार सोनार बांग्ला” और “एकला चलो रे” जैसी रचनाओं का उल्लेख करते हुए उनके वैश्विक दृष्टिकोण को रेखांकित किया गया।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण संगीत एवं मंच कला संकाय के छात्र आदित्य कुमार ठाकुर द्वारा प्रस्तुत रवीन्द्र संगीत रहा, जिसने सभागार में सांगीतिक वातावरण को जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम में प्रो. सुतपा दास, डॉ. अमित कुमार पाण्डेय, डॉ. ज्ञानेन्द्र नारायण राय और प्रो. शरदिन्दु कुमार तिवारी सहित विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
यह आयोजन भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवतावादी दृष्टि और विश्वबंधुत्व के विचारों को पुनर्स्मरण कराने वाला साबित हुआ।