भारतीय छायांकन जगत में यदि किसी एक नाम ने कैमरे को केवल उपकरण नहीं, बल्कि संवेदना, सत्य और समय का साक्षी बनाया, तो वह नाम है रघु राय। विश्वप्रसिद्ध छायाकार, पद्मश्री से सम्मानित रघु राय ने अपने कैमरे से भारत की आत्मा को जिस गहराई से देखा, वैसा विरल ही देखने को मिलता है। उनकी तस्वीरें केवल दृश्य नहीं, इतिहास के जीवंत दस्तावेज हैं। दिल्ली की गलियों से लेकर हिमालय की ऊँचाइयों तक, राजनीति से लेकर जनजीवन तक, और आध्यात्म से लेकर मानवीय संघर्ष तक, हर विषय पर उनकी दृष्टि अद्वितीय रही।
काशी से उनका संबंध विशेष और आत्मिक था। वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि उनके लिए समय, मृत्यु, मोक्ष, जीवन और अनश्वरता का खुला ग्रंथ था। लगभग चार दशकों से अधिक समय तक उन्होंने काशी को अपने कैमरे में बार-बार उतारा। घाटों की भोर, गलियों की धड़कन, साधुओं की समाधि, उत्सवों का उल्लास, श्मशान की निस्तब्धता और जनजीवन की सहजता, काशी के हर रंग को उन्होंने अमर कर दिया।
मेरी उनसे पहली मुलाकात एक सुंदर संयोग थी। वर्ष 2011 में काशी में एक परियोजना के दौरान मुझे उन्हें पबदु करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। एक युवा छायाकार के लिए यह किसी स्वप्न से कम नहीं था। मैंने देखा कि जिस व्यक्ति का नाम विश्व में आदर से लिया जाता है, वह कैमरे के सामने नहीं, कैमरे के पीछे एक तपस्वी की तरह कार्य करता है। प्रकाश के बदलते कोण, चेहरे की क्षणभंगुर अभिव्यक्ति, सड़क की हलचल, बादलों की चाल, उनकी दृष्टि हर सूक्ष्म तत्व पर केंद्रित रहती थी। फोटोग्राफी के प्रति उनका समर्पण मेरे लिए एक विश्वविद्यालय था।
उस प्रथम परिचय के बाद वर्षों तक अलग-अलग अवसरों पर उनसे मुलाकात होती रही। देश की अनेक छायांकन प्रतियोगिताओं में निर्णायक के रूप में उनके साथ मुझे भी आमंत्रण प्राप्त होता, तब पुनः संवाद का अवसर मिलता। कई प्रदर्शनियों में जहाँ वे मुख्य अतिथि रहते और मुझे भी विशिष्ट रूप से आमंत्रित किया जाता। हर बार उनका वही स्नेह, वही सहजता और वही उत्सुकता मुझे चकित करती थी। इतने बड़े व्यक्तित्व में अहंकार का लेशमात्र भी न होना, यही उनकी महानता थी।
वर्ष 2016-17 के उपरांत हमारे संबंधों में आत्मीयता बढ़ती गई। जब-जब वे काशी आते, उनसे मिलना और उनके साथ फोटोवॉक पर निकलना जैसे एक परंपरा बन गया। वे केवल छायाकार नहीं, गुरु के रूप में जीवन की कला भी सिखाते थे। वे बताते थे कि अच्छा फोटोग्राफर बनने से पहले अच्छा मनुष्य बनना आवश्यक है। वे कहते थे “पहले देखना सीखो, फिर क्लिक करना।” उनके साथ चलते हुए मैंने जाना कि कैमरा आँख से पहले हृदय से संचालित होता है।
उनसे जुड़े अनेक अविस्मरणीय प्रसंग आज भी मेरे भीतर दीपक की तरह जलते हैं। एक बार फोटोवॉक के दौरान उनके पैर में कुछ गड़ गया। जब मैंने उनके चरणों से वह काँटा निकाला, तो मुझे लगा मानो यह कोई साधारण क्षण नहीं, गुरु-सेवा का दुर्लभ अवसर है। एक विद्यार्थी के लिए इससे बड़ा सौभाग्य क्या हो सकता है कि वह गुरुजी के पथ में आए अवरोध को दूर कर सके। उस छोटे से क्षण में मेरे लिए श्रद्धा, प्रेम और सेवा का विराट अर्थ समाहित था।
वे काशी पर मेरे कार्य से अत्यंत प्रभावित थे। मैं जिन टाइमलेस छवियों पर काम कर रहा था, उन्हें वे ध्यान से देखते और विस्तार से चर्चा करते। मेरे कुछ फ्रेम उन्हें इतने प्रिय थे कि वे स्वयं उन्हें क्लिक करने का आग्रह करते। कई बार हम दुर्गम स्थानों तक साथ गए, ताकि वे वही दृश्य अपने कैमरे में कैद कर सकें। एक बार इसी उत्साह में वे लोलार्क कुंड स्थित कूप के ऊपर तक चढ़ गए। उस आयु में भी उनमें जो ऊर्जा, जो जिज्ञासा और जो बालसुलभ उत्साह था, वह देखने योग्य था। छायाचित्रों को पाने की उनकी भूख सदैव मुझे प्रेरित करती रही।
मैंने उनके साथ काशी को हर मौसम में देखा और क्लिक किया; भीषण गर्मी में, कड़ाके की सर्दी में, घने कोहरे में, मूसलाधार वर्षा में और बाढ़ के समय भी। एक बार बारिश के दौरान उन्होंने अपना ओवरकोट उतारकर मुझे पहना दिया। वह केवल एक ओवरकोट नहीं था; वह उनका स्नेह, उनका विश्वास और मेरे कंधों पर रखी गई एक मौन जिम्मेदारी थी। उस क्षण में गुरु और शिष्य का रिश्ता शब्दों से कहीं ऊपर उठ गया।
कई बार वे अपनी पत्नी गुरमीत जी और पुत्री अवनी के साथ काशी आए। उन अवसरों पर उनसे मिलना, उनके परिवार के साथ समय बिताना और पुनः फोटोवॉक करना भी अत्यंत स्मरणीय रहा। उनके व्यक्तित्व का एक कोमल, पारिवारिक और स्नेहमय पक्ष उन पलों में स्पष्ट दिखाई देता था।
उनके साथ फोटोवॉक कभी केवल घूमना नहीं था; वह चलता-फिरता विश्वविद्यालय था। हर मोड़ पर एक सीख, हर दृश्य में एक विचार, हर ठहराव में एक दर्शन छिपा होता था। एक बार उन्होंने मेरे साथ काशी विश्वनाथ धाम को डॉक्युमेंट करने की इच्छा व्यक्त की। मेरे अनुरोध पर विश्व भूषण हरिचंदन जी की कृपा से अनुमति प्राप्त हुई। वह दिन मेरे जीवन की अमूल्य स्मृतियों में शामिल है।
हमारी योजना उनके साथ श्रीराम जन्मभूमि मंदिर को डॉक्युमेंट करने की भी थी। बाबरी विध्वंस के समय वे अपने पुत्र के साथ अयोध्या में उपस्थित थे और उन्होंने उस ऐतिहासिक समय को कैमरे में दर्ज किया था। वे चाहते थे कि अब श्रीराम मंदिर निर्माण के बाद उसी कथा को पूर्णता दें। दुर्भाग्यवश अचानक अस्वस्थता के कारण यह योजना अधूरी रह गई।
उन्होंने मुझसे कहा कि काशी पर मेरे समय से परे चित्रों की एक पुस्तक अवश्य प्रकाशित होनी चाहिए। इस पुस्तक के लिए उन्होंने अत्यंत परिश्रम किया। संपूर्ण पुस्तक को स्वयं क्यूरेट और संपादित किया, आवरण चित्र का चयन किया और उसका नाम दिया 'Timeless Kashi'। मेरे लिए यह केवल पुस्तक नहीं, गुरु-आशीर्वाद का प्रसाद है। यह पुस्तक शीघ्र प्रकाशित होने जा रही है।
उनकी अपनी वाराणसी पर आधारित एक कॉफी टेबल बुक भी लगभग तैयार थी, जिसमें उन्होंने मेरे कुछ चित्रों को भी स्थान दिया। यह मेरे लिए किसी भी पुरस्कार से बढ़कर सम्मान है कि विश्वविख्यात रघु राय ने मेरे कार्य को अपनी दृष्टि से स्वीकारा।
काशी में हमारी अंतिम मुलाकात मैं कभी नहीं भूल सकता। विदा होते समय उन्होंने मेरे कंधे को चूमा और कहा “तुम्हारे कंधों पर बहुत जिम्मेदारी है, और तुम उसे समर्पण तथा ईमानदारी से निभाओगे।” ये शब्द मेरे लिए केवल वाक्य नहीं, आजीवन धारण करने योग्य मंत्र हैं।
Banaras Lit Fest के पिछले दो संस्करणों में मेरी इच्छा थी कि दुनिया के प्रतिष्ठित छायाकारों की दृष्टि से काशी को प्रदर्शनी रूप में प्रस्तुत किया जाए। इस विचार को हमने ‘बनारस क्रोनिकल’ नाम दिया। रघु सर ने न केवल मेरा मार्गदर्शन किया, बल्कि अपना और अपनी पुत्री अवनी राय का कार्य भी भेजा। अब ‘बनारस क्रोनिकल’ शीर्षक से उन्हें समर्पित एक कॉफी टेबल बुक पर कार्य चल रहा है, जिसे अगले संस्करण में लोकार्पित करने की योजना है।
उनके बारे में जितना लिखा जाए, उतना कम है। उनसे जुड़े संस्मरणों का भंडार इतना विशाल है कि शब्द बार-बार छोटे पड़ जाते हैं। वे केवल महान छायाकार नहीं थे; वे दृष्टि देने वाले गुरु, संवेदना सिखाने वाले साधक और जीवन को फ्रेम दर फ्रेम समझाने वाले ऋषि थे।
आज जब वे भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, तब भी उनकी उपस्थिति हर उस फ्रेम में है जहाँ सत्य है, हर उस प्रकाश में है जहाँ करुणा है, हर उस कैमरे में है जहाँ ईमानदारी है। उन्होंने हमें सिखाया कि तस्वीरें खींची नहीं जातीं; उन्हें जिया जाता है। काशी की भोर, घाटों की सीढ़ियाँ, गलियों की धूल और मनुष्यता की आँखों में आज भी उनका कैमरा चलता हुआ महसूस होता है। मेरे लिए वे केवल रघु राय नहीं, एक युग थे और ऐसे युग कभी समाप्त नहीं होते, वे पीढ़ियों तक प्रकाश देते रहते हैं।