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शिला से सभ्यता तक: बीएचयू में प्रागैतिहासिक तकनीक पर राष्ट्रीय मंथन”



 09/Apr/26

BHU Varanasi Workshop 2026: प्रागैतिहासिक शैल उपकरणों पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रागैतिहासिक लिथिक्स अध्ययन पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ, देशभर के शोधार्थियों और विशेषज्ञों की सहभागिता

वाराणसी, 09 अप्रैल 2026: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कला संकाय अंतर्गत प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग द्वारा शताब्दी वर्ष (2025–2026) के उपलक्ष्य में शिला से सभ्यता तक: प्रागैतिहासिक लिथिक्स अध्ययन कार्यशालाशीर्षक से तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ किया गया। यह कार्यशाला 9 से 11 अप्रैल 2026 तक आयोजित की जा रही है।

उद्घाटन सत्र में कुलपति अजित कुमार चतुर्वेदी ने कार्यशाला के महत्व को रेखांकित करते हुए सभ्यता की जड़ों को समझने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि प्रागैतिहासिक अध्ययन न केवल अतीत को समझने का माध्यम है, बल्कि वर्तमान शोध को दिशा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। साथ ही, उन्होंने शोधकर्ताओं को अंतरविषय सहयोग के माध्यम से शोध की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम की शुरुआत विभागाध्यक्ष महेश प्रसाद अहिरवार के स्वागत उद्बोधन से हुई, जिसमें उन्होंने प्रागैतिहासिक मानव जीवन के पुनर्निर्माण में लिथिक्स अध्ययन की अहम भूमिका को रेखांकित किया।

कार्यशाला के संयोजक जोस टॉम राफेल ने इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह आयोजन सैद्धांतिक ज्ञान और व्यवहारिक प्रशिक्षण के समन्वय के माध्यम से प्रागैतिहासिक प्रौद्योगिकी की व्यापक समझ विकसित करने का प्रयास है।

मुख्य अतिथि प्रदीप कुमार बेहरा ने कहा कि यह कार्यशाला प्रागैतिहासिक उपकरणों और तकनीकों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने का एक महत्वपूर्ण मंच है। वहीं, विशिष्ट अतिथि विजय नाथ मिश्र ने पुरातत्त्व में तंत्रिका विज्ञान आधारित अनुसंधानों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

कला संकाय की प्रमुख सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि लिथिक्स अध्ययन मानव इतिहास के प्रारंभिक चरणों को समझने के साथ-साथ उस समय की तकनीकी दक्षता और पर्यावरणीय अनुकूलन क्षमता को भी स्पष्ट करता है।

कार्यक्रम का समापन धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिसे विराग गोपाल सोंटक्के ने प्रस्तुत किया।

कार्यशाला में चेन्नई स्थित शर्मा विरासत शिक्षा केंद्र के विशेषज्ञ शांति पप्पू, कुमार अखिलेश और प्राची जोशी भी शामिल हुए। उनके सत्रों में लिथिक्स अध्ययन के सैद्धांतिक और व्यवहारिक पक्षों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

पहले दिन प्रतिभागियों को भारतीय प्रागैतिहास के प्रमुख विषयों का परिचय दिया गया। इसके बाद लिथिक्स अध्ययन की विधियों और तकनीकों पर सत्र आयोजित हुए। अपराह्न सत्र में प्रतिभागियों को व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया गया, जिसमें पत्थरों से उपकरण निर्माण की प्रक्रिया और विश्लेषणात्मक तकनीकों का अभ्यास शामिल रहा।

यह कार्यशाला व्याख्यान, व्यवहारिक सत्र और संवादात्मक चर्चाओं के माध्यम से द्विध्रुवीय एवं द्विमुखी तकनीकों, लेवलॉइस और लैमिनार रणनीतियों सहित प्रागैतिहासिक प्रौद्योगिकी के विभिन्न आयामों को समाहित कर रही है। देशभर से विद्यार्थी, शोधार्थी और शिक्षाविद इसमें भाग ले रहे हैं, जिससे यह आयोजन पुरातत्त्व के क्षेत्र में अनुभवात्मक अधिगम और शैक्षिक आदान-प्रदान का सशक्त मंच बन गया है।

 


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