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टीबी के इलाज में लापरवाही पड़ सकती है भारी, बीच में दवा छोड़ने से बढ़ता है MDR-TB का खतरा



 24/Mar/26

विश्व टीबी दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर वाराणसी में विशेषज्ञों ने दी चेतावनी, पूरा इलाज और समय पर दवा जरूरी

अधूरा इलाज बना सकता है टीबी को और खतरनाक, जागरूकता ही बचाव का सबसे बड़ा उपाय

वाराणसी में विशेषज्ञों की चेतावनी, टीबी की दवा बीच में छोड़ना हो सकता है खतरनाक

विश्व टीबी दिवस 2026 की पूर्व संध्या पर वाराणसी के ब्रीथ ईजी चेस्ट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में विशेषज्ञों ने कहा कि टीबी की दवा बीच में छोड़ने से MDR-TB का खतरा बढ़ जाता है। जानिए लक्षण, बचाव और इलाज की पूरी जानकारी।

वाराणसी, 24 मार्च 2026: विश्व टीबी दिवस की पूर्व संध्या पर अस्सी स्थित ब्रीथ ईजी चेस्ट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में आयोजित पत्रकार वार्ता में टीबी, श्वास और एलर्जी रोग विशेषज्ञ डॉ. एस. के. पाठक ने कहा कि टीबी अब लाइलाज बीमारी नहीं है, लेकिन इलाज में लापरवाही इसे बेहद खतरनाक बना सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि दवा बीच में छोड़ने से मरीज में मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी यानी MDR-TB विकसित हो सकती है, जिसका इलाज लंबा, महंगा और जटिल होता है।

डॉ. पाठक ने बताया कि सामान्य टीबी का इलाज पूरी तरह संभव है और इसमें आमतौर पर 6 से 8 महीने का समय लगता है। कई मरीज शुरुआती सुधार के बाद खुद को ठीक मान लेते हैं और बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद कर देते हैं। ऐसी स्थिति में शरीर के भीतर टीबी के जीवाणु दोबारा सक्रिय होकर दवाओं के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर सकते हैं। यही आगे चलकर MDR-TB का रूप ले सकता है।

उन्होंने कहा कि MDR-TB, टीबी का ऐसा रूप है जिसमें सामान्य फर्स्ट लाइन दवाएं असर नहीं करतीं। ऐसे मरीजों की बलगम जांच, कल्चर और सेंसिटिविटी टेस्ट के आधार पर सेकंड लाइन दवाएं शुरू की जाती हैं। इसका इलाज करीब दो साल तक चल सकता है। कई मामलों में यह मरीज के स्वास्थ्य के साथ-साथ आर्थिक स्थिति पर भी गंभीर असर डालता है।

डॉ. पाठक के अनुसार टीबी के प्रमुख लक्षणों में दो से तीन सप्ताह से अधिक समय तक खांसी, शाम के समय बुखार, बलगम या कफ में खून आना, लगातार वजन घटना, भूख कम लगना, सांस लेने में तकलीफ और सीने में दर्द शामिल हैं। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि भारत में टीबी अब भी बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। जागरूकता, समय पर जांच और पूरा इलाज ही इसके नियंत्रण का सबसे प्रभावी तरीका है। इलाज अधूरा छोड़ना न सिर्फ मरीज के लिए खतरनाक है, बल्कि समाज में दवा-प्रतिरोधी टीबी के फैलाव का कारण भी बन सकता है।

विश्व टीबी दिवस 2026 के मौके पर डॉ. पाठक ने कहा कि इस दिन का उद्देश्य टीबी उन्मूलन के लिए जागरूकता बढ़ाना, नीतिगत समर्थन मजबूत करना, निवेश बढ़ाना और नई स्वास्थ्य रणनीतियों को तेजी से लागू करना है। उन्होंने बताया कि टीबी के खिलाफ लड़ाई में बहुक्षेत्रीय सहयोग, समय पर पहचान और मरीजों को लगातार उपचार से जोड़कर रखना बेहद जरूरी है।

उन्होंने निक्षय पोषण योजना का भी जिक्र किया और कहा कि सरकार इलाज के दौरान टीबी मरीजों को पोषण सहायता उपलब्ध कराने की दिशा में काम कर रही है। इससे मरीजों को उपचार जारी रखने में मदद मिलती है।

बचाव के उपायों पर जोर देते हुए डॉ. पाठक ने कहा कि मरीजों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार पूरी अवधि तक दवा लेनी चाहिए। सार्वजनिक स्थानों पर थूकने से बचना चाहिए, खांसते या छींकते समय मुंह ढकना चाहिए और साफ-सुथरे व हवादार वातावरण में रहना चाहिए। टीबी मरीजों के लिए पौष्टिक भोजन, विशेषकर प्रोटीन और विटामिन युक्त आहार, काफी लाभकारी होता है।

उन्होंने बताया कि ब्रीथ ईजी की ओर से हर शुक्रवार सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक नि:शुल्क ओपीडी सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। अस्पताल समय-समय पर नि:शुल्क स्वास्थ्य शिविर, जनजागरूकता अभियान, क्लिनिक और मोबाइल कैंप भी आयोजित करता है।

 


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