आइसार्क और आईसीआरआईईआर के दो दिवसीय नीति संवाद में वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों ने टिकाऊ धान प्रणाली पर किया मंथन
वाराणसी | 08 मार्च 2026 |अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान के दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केंद्र (आइसार्क) और इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) द्वारा आयोजित दो दिवसीय नीति संवाद “भारत में टिकाऊ एवं सुदृढ़ धान प्रणाली के लिए धान नीतियों का पुनर्गठन: सीख और प्राथमिकताएँ” का समापन वाराणसी स्थित आइसार्क परिसर में हुआ।
इस उच्चस्तरीय संवाद में नीति-निर्माताओं, कृषि वैज्ञानिकों, निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों और किसान प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य भारत में धान खेती को अधिक टिकाऊ, जलवायु-अनुकूल और किसानों के लिए लाभकारी बनाने के लिए नई नीतिगत दिशा तय करना रहा।
आइसार्क के निदेशक डॉ. सुधांशु सिंह ने अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि दो दिनों तक चले विचार-विमर्श से धान नीतियों को अधिक प्रभावी बनाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि इन चर्चाओं से उत्तर प्रदेश, पूर्वी सिंधु-गंगा के मैदान तथा पूरे देश में धान उत्पादन को बढ़ाने, खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने और किसानों की आजीविका सुधारने में मदद मिलेगी।
समापन सत्र में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के सलाहकार अवनीश कुमार अवस्थी, पद्मश्री डॉ. ए. के. सिंह (पूर्व निदेशक, आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान), डॉ. शिव कुमार (निदेशक, आईसीएआर-राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान), डॉ. अशोक गुलाटी (विशिष्ट प्रोफेसर, आईसीआरआईईआर), डॉ. बलदेव राज कंबोज (कुलपति, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय), डॉ. यू. पी. सिंह (निदेशक, कृषि विज्ञान संस्थान, बीएचयू), डॉ. परेश वर्मा (महानिदेशक, फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया), डॉ. वीरेंद्र कुमार (शोध निदेशक, सीरिस-आईआरआरआई) सहित कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए अवनीश कुमार अवस्थी ने कहा कि कृषि क्षेत्र को मजबूत बनाने में नई तकनीकों और बेहतर नीतियों की अहम भूमिका है। उन्होंने धान की डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि इससे पानी की बचत होगी, उत्पादन बढ़ेगा और संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा। राज्य सरकार मशीनों के उपयोग के माध्यम से डीएसआर तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने की योजना बना रही है।
पद्मश्री डॉ. ए. के. सिंह ने कहा कि धान किसानों के लिए समय पर पानी की उपलब्धता और आधुनिक तकनीकों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश में बासमती धान की खेती की बड़ी संभावनाएँ हैं, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
कार्यक्रम के दौरान “ग्लोबल डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) कॉन्क्लेव” (5–7 अक्टूबर 2025, आइसार्क वाराणसी) की प्रोसीडिंग्स का भी विमोचन किया गया। इस प्रकाशन में जलवायु-अनुकूल और संसाधन-कुशल डीएसआर प्रणालियों को बढ़ावा देने से जुड़े वैश्विक अनुभव, शोध निष्कर्ष और नीतिगत सुझाव शामिल हैं।
संवाद के पहले दिन डॉ. अशोक गुलाटी ने भारत में डीएसआर को बढ़ावा देने के लिए नीति, उत्पाद, व्यवहार और साझेदारी जैसे चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित रणनीति पर जोर दिया। वहीं दूसरे दिन डॉ. वीरेंद्र कुमार ने कहा कि डीएसआर को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए विभिन्न संस्थानों के बीच समन्वय मंच और बहु-हितधारक नेटवर्क की आवश्यकता है।
इस दौरान “ग्रो इंडिगो” कार्बन क्रेडिट पहल पर भी चर्चा हुई, जिसके माध्यम से डीएसआर तकनीक अपनाने वाले किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। कार्यक्रम में श्वेत पत्र पर केंद्रित चर्चाएँ भी आयोजित हुईं, जिनमें विशेषज्ञों और राज्यों की टीमों ने मिलकर व्यवहारिक नीतिगत सुझाव तैयार किए।
दो दिनों तक चले इस संवाद ने भारत में धान खेती को आधुनिक, प्रतिस्पर्धी, पर्यावरण-अनुकूल और किसान-केंद्रित बनाने के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर नीतिगत सुधारों की मजबूत आधारशिला रखी। संवाद से प्राप्त सुझावों के आधार पर आगे विस्तृत श्वेत पत्र और रणनीतिक नीति दस्तावेज तैयार किए जाएंगे, जो भविष्य में सरकार और संबंधित संस्थानों को निर्णय लेने और योजनाओं के क्रियान्वयन में मार्गदर्शन देंगे।
वाराणसी में धान नीति पर राष्ट्रीय संवाद, डीएसआर तकनीक और जलवायु-अनुकूल खेती पर विशेषज्ञों का मंथन