MENU

सारनाथ की पहचान में बाबू जगत सिंह की भूमिका को आधिकारिक मान्यता, एएसआई ने लगाया संशोधित शिलापट्ट



 09/Mar/26

18वीं सदी में कराए गए उत्खनन से पहली बार प्रकाश में आया था सारनाथ स्थल, शोध समिति के प्रयास से बदला ऐतिहासिक अभिलेख

वाराणसी | 09 मार्च 2026 वाराणसी के ऐतिहासिक और विश्वप्रसिद्ध बौद्ध स्थल से जुड़ी एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मान्यता को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया है। प्रमाणिक दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों के अध्ययन के बाद ने यह मान लिया है कि सारनाथ स्थल को सबसे पहले 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बाबू जगत सिंह द्वारा कराए गए उत्खनन के माध्यम से पहचान मिली थी।

इसी मान्यता के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली द्वारा पत्रांक F.No.T-17/10/2024-EE (35099) दिनांक 10 फरवरी 2026 के अनुसार सारनाथ परिसर में एक नया संशोधित शिलापट्ट स्थापित किया गया है। इससे पहले 26 दिसंबर 2024 को भी परिसर में स्थित धर्मराजिका स्तूप से संबंधित शिलापट्ट को संशोधित कर नया शिलापट्ट लगाया गया था।

शोधकर्ताओं के अनुसार बाबू जगत सिंह ने 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में सारनाथ क्षेत्र में उत्खनन कार्य आरंभ कराया था, जिसके परिणामस्वरूप यह महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल पुनः प्रकाश में आया। हालांकि लंबे समय तक यह तथ्य इतिहास के पन्नों में दबा रहा। हाल के वर्षों में जगत सिंह रॉयल फैमिली प्रोजेक्ट शोध समिति के प्रयासों और प्रमाणिक ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर इस तथ्य को आधिकारिक मान्यता मिल सकी है।

समिति के संरक्षक प्रदीप नारायण सिंह ने बताया कि यह कार्य देश के प्रधानमंत्री की प्रेरणा से संभव हो सका। उन्होंने कहा कि समिति ने प्रमाणित दस्तावेज भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समक्ष प्रस्तुत किए, जिसके आधार पर औपनिवेशिक काल से चली आ रही गलत ऐतिहासिक मान्यता को अब संशोधित किया गया है।

प्रदीप नारायण सिंह, जो बाबू जगत सिंह की छठी पीढ़ी के वंशज हैं, ने कहा कि यह निर्णय केवल उनके परिवार या समिति के लिए ही नहीं बल्कि वाराणसी और देश की ऐतिहासिक विरासत के लिए भी गर्व का विषय है। उन्होंने कहा कि शोध कार्य निरंतर जारी है और भविष्य में कुछ नए ऐतिहासिक तथ्य भी सामने लाए जाएंगे।

इस शोध और शिलापट्ट संशोधन कार्य में काशी के विद्वानों, विभिन्न विश्वविद्यालयों और शोधकर्ताओं का भी योगदान रहा। इनमें , , तथा से जुड़े विद्वानों के साथ स्थानीय इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का सहयोग मिला। इसके अलावा वाराणसी गाइड एसोसिएशन और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का भी समर्थन प्राप्त हुआ।

पत्रकार वार्ता के दौरान शोध समिति के सदस्य अधिवक्ता त्रिपुरारी शंकर, प्रोफेसर राणा पी.बी. सिंह, अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह, अशोक आनंद, डॉ. (मेजर) अरविंद कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार दुबे, मनीष खत्री, अवनीधर, एहसन अहमद, विकास और शमीम सहित कई लोग उपस्थित रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस निर्णय से न केवल सारनाथ के इतिहास को नया आयाम मिला है, बल्कि स्थानीय ऐतिहासिक नायकों के योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने का मार्ग भी प्रशस्त हुआ है। समिति ने इतिहासकारों और शोधकर्ताओं से , और जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर भी प्राथमिक ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर नए शोध करने का आह्वान किया है।

वाराणसी के सारनाथ के इतिहास में बड़ा बदलाव, बाबू जगत सिंह के उत्खनन को एएसआई की आधिकारिक मान्यता

Meta Description (SEO):
वाराणसी के सारनाथ स्थल को 18वीं सदी में बाबू जगत सिंह द्वारा किए गए उत्खनन से पहली बार पहचान मिलने की बात को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने आधिकारिक रूप से स्वीकार किया। नए संशोधित शिलापट्ट भी लगाए गए।

अगर आप चाहें तो मैं इस खबर के लिए YouTube/Thumbnail Text और Google Discover में जाने वाला टाइटल भी बना सकता हूँ, जिससे Clown Times पर ट्रैफिक ज्यादा आएगा।

 


इस खबर को शेयर करें

Leave a Comment

2506


सबरंग