भूत-पिशाच बटोरी दिगम्बर खेले मसाने में होली, रंगभरी एकादशी के बाद काशी में शुरू हुआ होली उत्सव
वाराणसी। धर्मनगरी काशी के विश्व प्रसिद्ध महामशान मणिकर्णिका घाट पर रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन परंपरागत चिता भस्म की होली इस वर्ष खानापूर्ति जैसे हालातों के बीच किसी तरह संपन्न कराई गई। जहां एक ओर यह आयोजन सदियों से आस्था, अध्यात्म और शिव परंपरा का अद्भुत प्रतीक रहा है, वहीं इस बार व्यवस्थागत अव्यवस्था, प्रशासनिक प्रतिबंधों और सीमित अनुमति के कारण आयोजन अपनी पूर्व भव्यता से दूर नजर आया।
सुबह से ही श्रद्धालु दुनिया की दुर्लभ परंपरा — चिता भस्म से खेली जाने वाली होली — को देखने और उसमें सहभागी बनने के लिए मणिकर्णिका क्षेत्र में जुटने लगे थे। जिस स्थान पर सामान्य दिनों में शोक और अंतिम विदाई का वातावरण होता है, वहीं आज शहनाई की मंगल ध्वनि और “हर हर महादेव” के जयघोष से पूरा क्षेत्र शिवमय हो उठा।
श्रद्धालु इस दिव्य और अलौकिक दृश्य को अपनी अंतरात्मा में समाहित कर शिवोहम की अनुभूति करने को उत्सुक दिखाई दिए। मान्यता है कि संपूर्ण विश्व में काशी का मणिकर्णिका घाट ही ऐसा महाश्मशान है जहां मृत्यु भी उत्सव का स्वरूप धारण कर लेती है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब बाबा महाश्मशान नाथ के मध्याह्न स्नान का समय आता है, तब मणिकर्णिका तीर्थ का महत्व और बढ़ जाता है। इसी आस्था के चलते हजारों की संख्या में श्रद्धालु घाट की ओर पहुंचे।
हालांकि घाट पर चल रहे नव निर्माण कार्य और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के कारण श्रद्धालुओं को भारी पुलिस बल एवं बैरिकेडिंग के चलते मणिकर्णिका घाट जाने से रोका गया। कई भक्तों को ललिता घाट एवं सिंधिया घाट की ओर ही रोक दिया गया, जिससे उनमें निराशा देखी गई।
जो श्रद्धालु प्रतीक्षा कर सके, उन्हें दोपहर लगभग दो बजे के बाद बाबा महाश्मशान नाथ को भस्म अर्पित करने का अवसर प्राप्त हुआ।
धार्मिक मान्यता है कि बाबा के स्नान के पश्चात सभी तीर्थों का पुण्य यहां आकर एकत्र होता है और यहां स्नान करने वाले भक्तों को विशेष पुण्य प्राप्त होता है।
मान्यता के अनुसार बाबा शिव अपने प्रिय गणों — भूत, प्रेत, पिशाच और अदृश्य शक्तियों — के साथ महाश्मशान में चिता भस्म से होली खेलते हैं। काशी में यह परंपरा अनादि काल से चली आ रही है और होली उत्सव की आध्यात्मिक शुरुआत मानी जाती है।
काशीपुत्र गुलशन कपूर, व्यवस्थापक बाबा महाश्मशान नाथ मंदिर, ने बताया कि रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कराकर काशी लाते हैं और उसी के साथ होली उत्सव का आरंभ माना जाता है। देवता, गंधर्व, मनुष्य सभी इस उत्सव में शामिल होते हैं, जबकि बाबा के प्रिय गणों के लिए महाश्मशान में विशेष रूप से चिता भस्म की होली खेली जाती है।
बताया जाता है कि पिछले कुछ वर्षों से इस आयोजन का विरोध भी होने लगा था, जिसके चलते प्रशासनिक स्तर पर इस पर कड़ी निगरानी और कई बार रोक भी लगाई गई। परिणामस्वरूप इस वर्ष आयोजन पूरी भव्यता के बजाय सीमित स्वरूप में और खानापूर्ति जैसे हालातों में संपन्न हुआ।
फिर भी परंपरा को जीवित रखने के उद्देश्य से श्रद्धालुओं और आयोजकों ने धार्मिक रीति-रिवाजों का निर्वहन किया।
इस परंपरा को पुनर्जीवित करने का श्रेय बाबा महाश्मशान नाथ मंदिर के व्यवस्थापक गुलशन कपूर को दिया जाता है, जो पिछले 26 वर्षों से जनसहयोग और मीडिया के सहयोग से इस अनूठी परंपरा को विश्व स्तर तक पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं।
आयोजन के दौरान बाबा महाश्मशान नाथ एवं माता मशान काली (शिव-शक्ति) की मध्याह्न आरती की गई। बाबा को जया-विजया, मिष्ठान एवं सोमरस का भोग अर्पित किया गया।
इसके बाद चिता भस्म और गुलाल अर्पित कर माता मशान काली को लाल गुलाल चढ़ाते हुए होली का शुभारंभ किया गया। देखते ही देखते मंदिर प्रांगण और शवदाह स्थल भस्म से आच्छादित हो गया और पूरा वातावरण आध्यात्मिक उत्सव में परिवर्तित हो गया।
इस आयोजन में विशेष रूप से —
अघोर पीठाधीश्वर कपाली बाबा जी महाराज,
गुलशन कपूर (मंदिर व्यवस्थापक),
पं. विजय शंकर पांडेय,
अतुल झीगरन, अजय चौबे, सोनू कपूर, अंकित झीगरन, बिहारी लाल गुप्ता, मनोज शर्मा, दीपक तिवारी, विवेक चौरसिया, सुबोध वर्मा, करण जायसवाल सहित नागा साधु, संन्यासी, विरक्त, किन्नर एवं अघोरी साधक बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
विशेष रूप से —
स्वामी भारती महाराज जी,
राज राजेश्वरी मंदिर के शिष्य श्री भव शंकर चैतन्य जी महाराज,
मां पीतांबरा मंदिर के साधक एवं प्रधान पुजारी श्री सात्विक शुक्ला जी तथा मनोज सेठ भी आयोजन में शामिल हुए।
जलती चिताओं के बीच मनाया जाने वाला यह उत्सव विश्वभर में काशी की अद्वितीय आध्यात्मिक पहचान माना जाता है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु इस अनोखी परंपरा को देखकर जीवन के शाश्वत सत्य — मृत्यु और मोक्ष — का अनुभव करते हैं और स्वयं को शिव में समर्पित करने की भावना से भर उठते हैं।
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