शंकराचार्य का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं को हिंदू और सनातन परंपरा का रक्षक कहता है, तो उसके आचरण, निर्णय और शासन की दिशा भी उसी कसौटी पर परखी जाएगी। प्रयागराज स्नान विवाद केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस व्यापक संघर्ष की भूमिका है जिसमें धर्म, सत्ता और नैतिकता आमने-सामने खड़ी दिखाई दे रही है।
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का आरोप है कि जिस शासन में गौ-वंश के संरक्षण की बात कही जाती है, उसी शासन में वधशालाओं को अनुदान दिया जा रहा है। उनका प्रश्न सीधा है—क्या हिंदुत्व केवल भाषणों और मंचों तक सीमित है, या वह नीतियों और निर्णयों में भी दिखाई देगा?
प्रयागराज स्नान प्रकरण के बाद जिस प्रकार शंकराचार्य की धार्मिक मान्यता पर सवाल उठाए गए, उसी के बाद से उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्णयों, शपथ और जीवन-शैली को शास्त्रीय कसौटी पर कसना शुरू किया है। यह टकराव अब व्यक्तिगत नहीं, बल्कि वैचारिक और धार्मिक हो चुका है।
शंकराचार्य का कहना है कि हिंदू होना केवल वस्त्र, पद या सत्ता से प्रमाणित नहीं होता। हिंदू होने की पहचान शासन के हर निर्णय में करुणा, धर्म और मर्यादा से होती है। यदि राज्य का धन हिंसा से जुड़े कार्यों से आता है, तो उस धन से चलने वाला शासन धर्म की रक्षा कैसे कर सकता है?
उनका यह भी कहना है कि एक ओर संत, महंत और सन्यासी होने का दावा किया जाए और दूसरी ओर उसी राज्य व्यवस्था से वेतन और सुविधाएँ ली जाएँ, तो यह शास्त्रीय विरोधाभास है।
बीते 10 दिनों में यह विवाद लगातार तीखा हुआ है। प्रयागराज स्नान से शुरू हुई यह बहस अब पूरे देश में धर्म और सत्ता के संबंधों पर चर्चा का विषय बन चुकी है। शंकराचार्य स्पष्ट कर चुके हैं कि यह संघर्ष किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिए है।
प्रयागराज स्नान विवाद ने यह साफ कर दिया है कि अब प्रश्न केवल धार्मिक आयोजनों का नहीं, बल्कि शासन की आत्मा का है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच यह टकराव आने वाले समय में और गहराएगा।
यह संघर्ष तय करेगा कि सत्ता धर्म का साधन बनेगी या धर्म सत्ता के सामने मौन रहेगा। आने वाले 30 से 40 दिन न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि देश की धार्मिक और नैतिक दिशा के लिए निर्णायक सिद्ध हो सकते हैं।