संघर्ष ही कलाकार को चमकाता है, पानी पीकर भी गुजारे दिन : पद्मभूषण पं. साजन मिश्र
वाराणसी। पद्मविभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र के जीवन का संघर्ष ही उनकी लोकप्रियता और महान संगीत साधना का आधार बना। यह विचार बनारस लिट् फेस्ट की पहली शाम आयोजित परिचर्चा सत्र में वक्ताओं ने व्यक्त किए।
परिचर्चा सत्र को संबोधित करते हुए पं. अमिताभ भट्टाचार्य ने कहा कि पं. छन्नूलाल मिश्र एक उभयचर कलाकार थे। उन्होंने संगीत की उस पुरानी धारणा को तोड़ा, जिसमें शास्त्रीय संगीत को दरबारों तक सीमित और लोक संगीत को सामान्य जन या गरीबों का संगीत माना जाता था।
पं. छन्नूलाल मिश्र ने लोक संगीत को दरबार तक पहुंचाया और दरबारी संगीत को आम जनता के बीच स्थापित किया। उनके गायन की विशेषता यह थी कि वह सुरों के माध्यम से रामायण और शिवकथा जैसे पौराणिक कथानकों को प्रभावी ढंग से जन-जन तक पहुंचाते थे।
पद्मभूषण पं. साजन मिश्र ने कहा कि पं. छन्नूलाल मिश्र का स्वभाव जितना सहज और सरल था, उनका संगीत भी उतना ही आत्मीय और प्रभावशाली था। उन्होंने अपने जीवन में अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना किया। ऐसे दिन भी आए, जब सुबह के नाश्ते से लेकर रात के भोजन तक केवल पानी पीकर ही गुजारा करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि संघर्ष ही कलाकार को निखारता है और पं. छन्नूलाल मिश्र का संघर्ष उन्होंने स्वयं बहुत करीब से देखा और महसूस किया। पारिवारिक संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि वह रिश्ते में उनके जीजा थे और कहीं भी मिलने पर उन्हें प्रेम से “सरऊ” कहकर संबोधित करते थे।
सत्र में मौजूद पद्मश्री सितारवादक पं. शिवनाथ मिश्र ने कहा कि जब पं. छन्नूलाल मिश्र प्रारंभिक दौर में बनारस आए थे, तब उन्हें कोई नहीं जानता था। उन्होंने यहां शिक्षक के रूप में भी कार्य किया और गंभीर आर्थिक व सामाजिक कठिनाइयों का सामना किया। ऐसे कलाकार विरले ही जन्म लेते हैं, जिन्होंने संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। वह दिल्ली तक जाकर संगीत सिखाते थे और बनारस में भी अनेक शिष्यों को तैयार किया।
इस परिचर्चा सत्र में बांसुरी वादक पं. राजेंद्र प्रसन्ना और विधान परिषद सदस्य धर्मेंद्र सिंह ने भी स्मृतिशेष पं. छन्नूलाल मिश्र के जीवन, संघर्ष और संगीत साधना पर विस्तार से अपने विचार रखे।
सत्र का संचालन सौरभ चक्रवर्ती ने किया।