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वाराणसी के अस्सी घाट से गंगा आरती के काशी साहित्य कला उत्सव 2026 का हुआ शंखनाद



 30/Jan/26

Baranara Lit Fest 2026 | वाराणसी। काशी की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, साहित्य, ललित कला और संगीत के अद्भुत संगम के साथ गुरुवार की संध्या अस्सी घाट पर बनारस लिट फेस्ट काशी साहित्य कला उत्सव का भव्य शुभारंभ हुआ। गंगा तट पर आयोजित इस सांस्कृतिक संध्या में शास्त्रीय, लोक और पाश्चात्य संगीत का समन्वय देखने को मिला, जिसने बड़ी संख्या में उपस्थित श्रोताओं को आकर्षित किया।

पं.देवव्रत मिश्र के फ्यूजन में रहा गायन के कन्फ्यूजन का संगम

कार्यक्रम की शुरुआत काशी के बनारस घराने से जुड़े सुप्रसिद्ध सितार वादक देवव्रत मिश्रा एवं उनकी टीम की प्रस्तुति से हुई। उन्होंने राग यमन से आरंभ करते हुए “सांसों की माला”, कबीर के पद “चदरिया झीनी रे झीनी” तथा राग अड़ाना में निबद्ध “शिव शिव” की प्रस्तुति दी।

फ्यूजन के इस प्रयास में देवव्रत मिश्रा ने सितार वादन के साथ गायन का भी प्रयोग किया। यह प्रयोग मनोरंजन के स्तर पर तो प्रभावी रहा, लेकिन संगीत के शुद्ध स्वर और वह मिठास, जिसके लिए बनारस घराने की गायकी पहचानी जाती है, उससे यह प्रस्तुति कुछ दूरी पर खड़ी नजर आई। मीडिया और संगीत के जानकारों के बीच यह चर्चा रही कि फ्यूजन के बहाने गायन और वादन के बीच संतुलन कम और कन्फ्यूजन अधिक दिखाई पड़ा। एक बनारस घराने के सितार वादक से जिस ठहराव और शास्त्रीय गंभीरता की अपेक्षा होती है, वह इस प्रयोग में पूरी तरह उभर नहीं सकी, हालांकि दर्शकों ने तालियों और हर हर महादेव के उद्घोष से उत्साह जरूर जताया।

आस्था और परंपरा का क्षण,
गंगा आरती और गणेश वंदना

गंगा सेवा समिति द्वारा विधिवत गंगा आरती के पश्चात गणेश वंदना और सांगीतिक संध्या के साथ काशी साहित्य कला उत्सव का औपचारिक शुभारंभ किया गया। घाट का वातावरण आध्यात्मिकता और कला के संगम से भर उठा।

लोक की आत्मा, माटी की खुशबू
प्रियंका भट्टाचार्य की सधी हुई प्रस्तुति

इस संगीतिक संध्या का सबसे प्रभावशाली पक्ष युवा लोक गायिका प्रियंका भट्टाचार्य की प्रस्तुति रही। अपने कार्यक्रम की थीम “माटी के रंग” के माध्यम से उन्होंने लोक संगीत की जड़ों, उसकी संवेदना और उसकी आत्मा को बेहद सहज और प्रभावी ढंग से मंच पर उतारा। प्रियंका भट्टाचार्य की गायकी ने श्रोताओं को शुरुआत से अंत तक बांधे रखा।

उन्होंने बनारस के लोक संगीत से लेकर पश्चिम बंगाल, गुजरात, पंजाब सहित देश के विभिन्न प्रदेशों के लोकगीतों की प्रस्तुति दी। उनकी आवाज़ में माटी की सोंधी खुशबू, लोक जीवन की सरलता और परंपरा की गरिमा स्पष्ट रूप से महसूस की गई। “माटी के रंग” की संकल्पना के साथ प्रस्तुत इन गीतों ने यह साबित किया कि लोक संगीत आज भी श्रोताओं के मन से सीधा संवाद करता है और उसकी प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती। इसके अलावा “माटी की खुशबू” बैंड के कलाकारों ने संस्कार और संवेदना से भरे गीतों की प्रस्तुति देकर संध्या को और यादगार बना दिया। विभिन्न कलाकारों की संगत ने लोक और समकालीन संगीत के मेल को और प्रभावशाली बनाया।

डॉ. दीपक मधोक व बृजेश सिंह के नेतृत्व में Banaras Lit Fest में इनकी रही सहभागिता

बनारस लिट फेस्ट काशी साहित्य कला उत्सव आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ.दीपक मधोक, सचिव बृजेश सिंह सहित वरिष्ठ एवं प्रमुख सदस्य अमित शेवरामनी, धवल प्रकाश, आशीष कुमार, अमित मौर्य, अंकित कुमार, खालिद अंसारी, धर्मेंद्र कुमार, अपर्णा सिंह, शुभाशीष चटर्जी, त्रिनेत्र, अनय, अंशिका आदि की सक्रिय सहभागिता रही।

इस अवसर पर पद्मश्री शीन काफ़ निजाम, मदन मोहन दानिश सहित अनेक प्रख्यात कवि, लेखक, शायर, संस्कृतिकर्मी और समीक्षक उपस्थित रहे। भारी संख्या में पहुंचे श्रोताओं ने इस सांस्कृतिक आयोजन को जीवंत और स्मरणीय बना दिया।

कार्यक्रम का संचालन अभिषेक तिवारी एवं आरजे विशाल ने किया।

मीडिया प्रबंधन की जिम्मेदारी प्रमोद (@pmediaa) द्वारा निभाई जा रही है।


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