वाराणसी, 29.01.2026: भारतीय सभ्यता के सार को समझने से ही सभ्यता की निरंतर यात्रा की मजबूती सुनिश्चित हो सकेगी, यह बात कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने महामना सभागार, मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र, में आयोजित “भारतीय दर्शन में लोकदृष्टि और मानव मूल्य” विषयक त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में कहा। संगोष्ठी 29–31 जनवरी 2026 के बीच संस्कृत विभाग, कला संकाय तथा भारत अध्ययन केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (आईसीपीआर) एवं केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित की जा रही है।
प्रो. चतुर्वेदी ने कहा कि हजारों वर्षों से भारतीय सभ्यता ने उत्थान और पतन के अनेक चरण देखे हैं, किंतु उसने प्रत्येक संकट को पार कर और अधिक सशक्त रूप में स्वयं को स्थापित किया है। उन्होंने रेखांकित किया कि दर्शन सभी विद्याओं की आधारशिला है तथा शैक्षणिक मंचों को केवल प्रशंसा तक सीमित न रहकर प्रश्न, आलोचनात्मक चिंतन और संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संगोष्ठियाँ समझ और बौद्धिक आदान-प्रदान के महत्वपूर्ण मंच होती हैं।
सत्र की अध्यक्षता करते हुए पद्म भूषण आचार्य वशिष्ठ त्रिपाठी, पूर्व कुलपति, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, ने भारत की दार्शनिक परंपराओं और मूल्य प्रणालियों को जीवंत बनाए रखने के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन जीवन, समाज और मानव मूल्यों को समझने का समग्र ढांचा प्रदान करता है तथा शास्त्रीय ज्ञान परंपराओं के साथ गहन विद्वत्-संलग्नता की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. सुषमा घिल्डियाल, संकाय प्रमुख, कला संकाय ने भारतीय ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और संवर्धन में शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान को समकालीन अकादमिक विमर्श से जोड़ने के लिए अंतर्विषयक संवाद और विद्वत् चर्चा अत्यंत आवश्यक है।
विशिष्ट वक्ता के रूप में पूर्व संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. कमला प्रसाद सिंह ने विभाग की समृद्ध शिक्षण परंपरा का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि विभाग की दीर्घकालिक अकादमिक साधना और विद्वत्ता इस संगोष्ठी के रूप में सार्थक अभिव्यक्ति प्राप्त कर रही है।
सास्वत अतिथि प्रो. श्रीकिशोर मिश्र, पूर्व संकाय प्रमुख, कला संकाय ने भारतीय दर्शन में लोकदृष्टि तथा मानवमूल्य विषयक शास्त्रसम्मत परंपरा से परिचित कराया। साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन विचिलित नहीं हुआ क्योंकि उसने वेद को स्त्रोत माना। प्रो. मिश्र ने सांख्य दर्शन के हवाले से कहा कि तमस के बिना यह सृष्टि नहीं चल सकती।
इस अवसर पर उपस्थित अतिथिगणों का स्वागत करते हुए संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर सदाशिव कुमार द्विवेदी ने माननीय कुलपति जी की भारतीय विद्याओं के समर्पण की भावना व निष्ठा की प्रशंसा की तथा अन्य अभ्यागत विशिष्ट आचार्यों का परिचय तथा कार्यक्रम की रुपरेखा को प्रस्तुत किया। प्रोफेसर द्विवेदी ने शास्त्रों के व्यावहारिक व पारमार्थिक पक्ष पर प्रकाश डाला। व्यवहार का उद्देश्य परमार्थ की सिद्धि है, यही है दर्शन की लोकदृष्टि।
कार्यक्रम का संचालन तथा धन्यवाद ज्ञापन भारत अध्ययन केंद्र के समन्वयक प्रो. शरदिन्दु कुमार तिवारी ने किया, जिसमे सभी गणमान्य अतिथियों, विद्वानों और प्रतिभागियों के प्रति उनकी उपस्थिति और योगदान के लिए आभार व्यक्त किया।
इस संगोष्ठी में अमेरिका, त्रिनिदाद एवं टोबैगो, इटली, जर्मनी, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और ईरान सहित विभिन्न देशों के विद्वान तथा भारत भर के संस्थानों से प्रतिनिधियों की भागीदारी रही है। 14 तकनीकी सत्रों का आयोजन किया जायेगा, जिनमें भारतीय ज्ञान परंपराओं में लोक और शास्त्र का समन्वय, दर्शन और समाज, भाषा और लोक संस्कृति, पर्यावरण, स्वास्थ्य और शिक्षा तथा भारतीय दार्शनिक मूल्यों की समकालीन व्याख्याएँ जैसे विषय सम्मिलित हैं।
30 जनवरी 2026 को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के सहयोग से “वसंतोत्सव” शीर्षक से एक सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा। पं. ओम प्रकाश मिश्र के निर्देशन में प्रस्तुत कथक नृत्य प्रस्तुति लय और भाव के माध्यम से वसंत ऋतु की सुंदरता और उल्लास को साकार करेगी।
31 जनवरी 2026 को आयोजित होने वाले समापन सत्र की अध्यक्षता जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रो. प्रद्योत कुमार मुखोपाध्याय करेंगे।