वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संगीत एवं मंच कला संकाय के वाद्य विभाग द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय कार्यशाला का प्रथम दिवस पं. ओंकारनाथ ठाकुर प्रेक्षागृह में सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर प्रसिद्ध सितार एवं सुरबहार वादक पंडित रामप्रपन्न भट्टाचार्य जी, जो कि इमदादखानी घराने के प्रमुख प्रतिनिधि हैं, विशेष विषय विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहे।
पंडित रामप्रपन्न भट्टाचार्य जी ने भारतीय शास्त्रीय संगीत की साधना में साढ़े तीन दशकों से अधिक के अपने समर्पित योगदान के अनुभव साझा करते हुए इटावा घराने की तकनीकी, रियाज़ पद्धति, बंदिशें एवं रागदारी पर विस्तृत मार्गदर्शन प्रदान किया।
कार्यशाला की आयोजन सचिव प्रो. संगीता सिंह (वाद्य विभाग) ने कार्यशाला का सफल संचालन करते हुए पंडित रामप्रपन्न भट्टाचार्य जी का माँ सरस्वती की आराधना के साथ स्वागत, त्रिमूर्तियों का माल्यार्पण एवं कलाकार का विशेष अभिनंदन किया।
इस अवसर पर संगीत एवं मंच कला संकाय की संकाय प्रमुख प्रो. संगीता पंडित, संयोजक प्रो. राजेश शाह (विभागाध्यक्ष), आयोजन सचिव प्रो. संगीता सिंह (वाद्य विभाग), सह-आयोजन सचिव डॉ. प्रेम किशोर मिश्र एवं डॉ. सुप्रिया शाह सहित संकाय के अनेक प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यशाला के प्रथम दिन पंडित रामप्रपन्न भट्टाचार्य जी ने अपने गुरुओं का स्मरण करते हुए अपना परिचय दिया तथा अपने घराने की विशिष्ट वादन तकनीकों को उजागर किया। उन्होंने संगीत की मूल तकनीकों, सनातन परंपरा से जुड़ाव एवं उनके महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने महान गायक पंडित भीमसेन जोशी जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि “रियाज़ ही सबसे बड़ी साधना है, जिसे मंत्र साधना की भांति निरंतर एवं एकाग्रता के साथ करना चाहिए।”
उन्होंने सितार वादन की महत्वपूर्ण तकनीक ‘मींड’ की बारीकियों पर भी विस्तार से चर्चा की तथा विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से कार्यशाला को अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी बनाया। सत्र के दौरान सहभागियों द्वारा पूछे गए सभी प्रश्नों का उन्होंने सहजता एवं विस्तारपूर्वक समाधान किया।
कार्यशाला के त्रिदिवसीय आयोजन के प्रथम दिन के प्रथम सत्र का समापन पं. ओंकारनाथ ठाकुर प्रेक्षागृह, बीएचयू में हुआ।