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मणिकर्णिका केवल महाश्मशान नहीं, काशी के पंचतीर्थों में सर्वश्रेष्ठ



 21/Jan/26

पेशवा बाजीराव के सहयोग से हुआ था कुंड का पुनर्निर्माण, अहिल्याबाई होलकर ने बनवाया था जनाना घाट

वाराणसी। काशी के मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्य के दौरान मंदिरों को नुकसान पहुंचने और मढ़ी से अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा अलग होने को लेकर इन दिनों विवाद बना हुआ है। इस पूरे विवाद को समझने के लिए मणिकर्णिका घाट के वर्तमान निर्माण कार्य के साथ उसके धार्मिक महात्म्य, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भौगोलिक स्वरूप को जानना आवश्यक है।

मणिकर्णिका केवल काशी का महाश्मशान ही नहीं, बल्कि गंगा तट स्थित काशी के पंचतीर्थों में सर्वश्रेष्ठ तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान शिव और माता पार्वती यहां स्थित कुंड का अवलोकन कर रहे थे, तभी पार्वती के कान का मणि चक्रपुष्करिणी कुंड में गिर गया। इसी घटना के कारण इस तीर्थ का नाम मणिकर्णिका पड़ा।

काशीखंड में वर्णित है मणिकर्णिका की महिमा

काशीखंड में मणिकर्णिका तीर्थ की विशेष महिमा का वर्णन मिलता है। इसमें कहा गया है
जहां मृत्यु मंगल मानी जाती है, जहां जीवन सफल होता है और जहां स्वर्ग तिनके के समान समझा जाता है, वही श्री मणिकर्णिका तीर्थ है।
प्राचीन काल में मणिकर्णिका तीर्थ का क्षेत्रफल वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत था।

मराठा शासनकाल में हुआ घाटों और मंदिरों का विकास

काशी की कन्या मणिकर्णिकापुस्तक के लेखक उपेन्द्र विनायक सहस्त्रबुद्धे के अनुसार, 18वीं शताब्दी के मध्य काशी के विकास में मराठों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। मराठा शासकों और पेशवाओं ने काशी में अनेक घाटों और मंदिरों का निर्माण कराया।

मणिकर्णिका कुंड का पक्का पुनर्निर्माण वर्ष 1730 में पेशवा बाजीराव के सहयोग से सदाशिव नाइक द्वारा कराया गया था। मान्यता है कि मणिकर्णिका कुंड में स्नान के पश्चात गंगा स्नान किया जाता है और इस तीर्थ पर महिलाओं का भी आगमन होता है।

अहिल्याबाई होलकर का योगदान और जनाना घाट

महिलाओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बाद में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने तारकेश्वर महादेव मंदिर के पीछे दाईं ओर यूआकार का घाट बनवाया, जिसे जनाना घाट कहा जाता है। पुनर्विकास कार्य के दौरान इसी घाट की मढ़ी क्षतिग्रस्त हो गई, जिससे उसमें उकेरी गई अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा बाहर आ गई। प्रशासन ने प्रतिमा को संरक्षित कर लिया है और पुनर्विकास पूर्ण होने के बाद इसे पुनः स्थापित किया जाएगा।

जलासेन घाट और शवदाह की स्थिति

जनाना घाट के दाईं ओर घुड़दौड़ भवन और मरघट मसान नाथ मंदिर स्थित है, जिसके सामने वर्तमान में शवदाह किया जा रहा है। इसके आगे प्राचीन मणिकर्णिका तीर्थ की शेष भूमि पर जलासेन घाट का निर्माण हुआ था।

पुनर्विकास से पहले अधिकांश शवों का दाह संस्कार जलासेन घाट पर ही किया जाता था। लगातार शवदाह के कारण वहां के पत्थर और संरचनाएं नष्ट हो चुकी थीं। जगह की कमी के कारण परिक्रमा करना कठिन हो जाता था और पास-पास जलती चिताओं से लोगों के पैर तक झुलस जाते थे।

पुनर्विकास कार्य धीमा, लेकिन आवश्यक

वर्तमान में जलासेन घाट पर पुनर्विकास कार्य जारी है, हालांकि इसकी गति धीमी बताई जा रही है। इसके आगे श्रीकाशी विश्वनाथ कॉरिडोर की बाउंड्री स्थित है। मणिकर्णिका तीर्थ के बाईं ओर की भूमि पर बाद में ग्वालियर के महाराजा दौलतराव सिंधिया की पत्नी रानी बैजाबाई सिंधिया ने पक्के घाट का निर्माण कराया, जिसे आज सिंधिया घाट के नाम से जाना जाता है। वर्तमान में अधिकांश श्रद्धालु यहीं स्नान करते हैं।

सिंधिया घाट तक होगा पुनर्विकास

घाट क्षेत्र के निवासी गौरव द्विवेदी के अनुसार, मणिकर्णिका घाट का पुनर्विकास कार्य जलासेन घाट से लेकर सिंधिया घाट तक प्रस्तावित है। वर्तमान में मणिकर्णिका घाट का विस्तार दक्षिण में जलासेन घाट और उत्तर में सिंधिया घाट के मध्य है।

दूर-दराज से आने वाले सनातनी श्रद्धालुओं के लिए यह पुनर्विकास कार्य निश्चित रूप से एक सकारात्मक पहल है, लेकिन स्थानीय लोगों और धार्मिक समुदाय को विश्वास में लेकर कार्य को तेजी और संवेदनशीलता के साथ पूरा किया जाना आवश्यक है।

 


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