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निर्भीक पत्रकारिता का युगांत: बनारस की खबरों के बादशाह गोपेश पाण्डेय को श्रद्धांजलि

प्रो. सतीश कुमार राय

 13/Jan/26

कभी बनारस में खबर की दुनिया के बादशाह रहे अजीज सहपाठी मित्र गोपेश पाण्डेय के हम सबको छोड़ कर अनन्त की ओर चले जाने की खबर आहत कर गई है। अपने खास अंदाज और बड़े खास तेवर की प्रखर पत्रकारिता की खुद में मिसाल रहे गोपेश पाण्डेय को इस बार की जानलेवा सर्दी हमसे छीन ले गई। उन पर बेशक हमें गौरव था। सत्तर के दशक में बीएचयू छात्र जीवन में उनके अल्हड़पन, उनकी शोख शरारतों से बनारस में पत्रकारिता के क्षितिज पर वक्त के साथ स्थापित हुते उनके उस कद्दावर पत्रकारीय स्वरूप की महिमा तक, गोपेश पाण्डेय से जुड़ी स्मृतियों या सिहरन से गुदगुदी तक देने वाले कितने ही उनसे जुड़े संस्मरण उनके निधन की व्यथा से खुल पड़े स्मृतियों के  झरोखे से झांकने लगे हैं।‌ दुख के  इस मौके पर उनकी पत्रकारिता के उस स्वरूप को सेल्यूट है, जिसके सामने अच्छे अच्छे  राजनीतिज्ञों को घबड़ाते और बड़े बड़े नौकरशाहों को सहम कर सिमटे हुये देखा है। ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा में पगी पत्रकारिता को गोपेश जी ने बड़ी शिद्दत से जिया था। उनके इस पेशे ने‌ उन्हें भरपूर यश एवं सम्मान दिया, तो उस दौर के शोषण से आहत रही पत्रकारिता की तंगी भी उनके खाते में थी। फिर भी पेशागत ईमान से कभी लेशभर समझौता नहीं किया। इन सबसे बेपरवाह रह एक ही अखबारी घराने की एकनिष्ठा भी निभाई, भले उसने उसकी कद्र नहीं की हो।

याद आता है कि पढ़ाई के वक्त जब गोपेश कहते कि कि पत्रकार बनूंगा तो दोस्त हंसते थे, पर संकल्प शक्ति का क्या महत्व होता है, इसे अपने पत्रकारीय जीवन संघर्ष में उन्होंने बखूबी साबित किया। अपनी कलम में ताकत की वो स्याही भरी, जो अच्छे अच्छों के दांत खट्टे कर दे। उनके समाचार लेखन के एक एक शब्द में वो ताकत होती थी कि सत्ता और शक्ति के बड़े दुर्गों को भी हिला कर रख दे। किसी बड़े ओहदे के आला अफसर का तबादला बनारस में हो जाय और यहां रहे किसी वरिष्ठ अधिकारी से बनारस आने के पहले टिप्स मांगे, तो यही परामर्श मिलता था कि बनारस अच्छा है, जाओ, पर  वहां गोपेश पाण्डेय से होशियार रहना। पत्रकारीय व्यक्तित्व के उस रुतबे का आलम ये था कि गोपेश किसी कालोनी में किसी मित्र के यहां भी पहुंच जांय तो कालोनी में चर्चा हो जाती कि उनके घर तो गोपेश पाण्डेय आये हैं।

गोपेश की दोस्ती 70 के दशक के अंत और 80 के दशक के आरंभ में मुझे भी पत्रकारिता में घसीट ले आई थी। डेढ़ दशक से ज्यादा उसमें रमा, पर जब विश्वविद्यालय शिक्षण और पत्रकारिता के दोहरे दायित्वों का एक साथ बोझ भारी लगने लगा, तब अखबारों से औपचारिक रिश्ता छूटा। फिर भी उस दौर के अखबारी मित्रों की वजह से ही फ्री लांस या अनाम भी लिखते रहना या कभी तो छद्म नाम से भी लिखना और विश्वविद्यालय से राजनीतिक दल तक की अधिकृत प्रवक्ता गिरी तक ने समाचार लेखन की लत से तो हमेशा जोड़े ही रखा। वह‌ लत ही अब सोशल मीडिया पर भी पोस्ट्स लिखवा डालती है। बेशक इन सबकी बुनियाद में तो गोपेश ही थे।

गोपेश पाण्डेय अपने दौर में निर्भय और स्वतंत्र पत्रकारिता के प्रतिमान थे। पुलिस, प्रशासन ही नहीं, राजनीतिक दुर्गों से भी एलानिया टकराने की मिसाल थे। उसकी अंत:शक्ति से सम्पन्न इसलिये थे, क्योंकि गोपेश पाण्डेय को खरीदने की कोई कल्पना नहीं कर सकता था। अपनी कलम से उत्प्रेरित कर बहुतों को नेता बना दिया, तो कईयों की नेतागिरी का पानी उतार कर रख दिया। लेखन ऐसा चुस्त कि कभी मानहानि का केस बन ही न सके। अन्याय किसी के साथ हो, उनकी कलम न्याय के लिये किसी से भी टकरा सकती थी। प्रशासन तंत्र के साथ उनके ऐसे दर्जनों टकरावों में अंततः सम्बद्ध नामी अफसरों को ही बनारस छोड़ना पड़ा था। कभी एक छात्र नेता की पुलिस कस्टडी में इंतहा पिटाई पर बड़ा रोष था और वैसा करने वाले दो आला पुलिस अफसरों को नाम से इंगित कर तीखी न्यूज स्टोरी की व्यंग्यात्मक हेडिंग आज भी बहुतों को याद है, **"शबाब जावेद, शाबास हिम्मत, तुम्हारी हिम्मत को सलाम"**। उस एक स्टोरी ने दोनों अफसरों का बनारस से बोरिया बिस्तर बंधवा दिया था। पत्रकारों के मान सम्मान के लिये या कलम की आजादी के लिये तो वह किसी से टकरा जाते थे। फिर भी रात को दो-तीन बजे भी दफ्तर से छूटना और अकेले घर आना। एक बार बनारस एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री को आकर, वहीं से मऊ जाना था। काशी पत्रकार संघ के तब अध्यक्ष रहे गोपेश जी सहित 11 पत्रकार वहां कवरेज हेतु गये, पर अंदर नहीं जाने दिया गया। बस पोर्टिको में ही सबको लेकर वह धरने पर बैठ गये। मैं तब कांग्रेस का प्रवक्ता भी था और उनके साथ बारहवां मुझे भी बैठना पड़ा। प्रशासन के हांथ पांव फूलने लगे। कलेक्टर और एसएसपी दोनों अंदर न जाकर वहीं खड़े रहे। अंततः गिरफ्तारी हुई और सबको बड़ागांव थाने ले जाया गया। वहां भी कुछ देर नारेबाजी चली। कलेक्टर सौरभ चन्द्र से उनके अच्छे सम्बन्ध थे, पर वह कुछ काम न आ रहे थे। कलेक्टर ने मऊ में प्रधानमंत्री नरसिम्हराव के लिये खबर भिजवाई। वहां से संदेश आया की तीन घंटे बाद वापसी में वह एयरपोर्ट पर ही पत्रकारों से बातचीत करके दिल्ली जायेंगे। प्रशासनिक मजबूरीवश गिरफ्तार किये गये सभी पत्रकार सरकारी मेहमान हो गये और वहीं साथ बैठे रहे कलेक्टर, एसएसपी ने खुद रनवे पर ले जाकर सबको प्रधानमंत्री से मिलवाया। रनवे पर खड़े खड़े पैंतीस मिनट प्रधानमंत्री ने बात की। प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ तो उन्हें एक बार चीन यात्रा का भी मौका मिला था, जहां अपने बेबाक सवाल से वह चर्चा में रहे। पत्रकारिता का यह तेवर और उसकी यह धमक आज दुर्लभ है।


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