आज 12 जनवरी 2026 को स्वामी विवेकानन्द जयन्ती 'राष्ट्रीय युवा दिवस' के अवसर पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र एवं अन्तर सांस्कृतिक अध्यापन केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में 'आज का समय और स्वामी विवेकानन्द' विषयक विशिष्ट व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस विशिष्ट व्याख्यान के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध विचारक एवं आलोचक और हिन्दी विभाग, काहिविवि के पूर्व आचार्य प्रो. अवधेश प्रधान थे। अपने उद्बोधन में प्रो. प्रधान ने कहा कि ‘स्वामी विवेकानंद पर चर्चा करने का अवसर मिलना मेरे लिए सदैव सुखकर होता है। शिकागो में स्वामी विवेकानन्द का बोलना एक रूपक की तरह था। सैकड़ों वर्षों बाद किसी सन्यासी ने समुद्रपार की यात्रा की और विश्वमन्च पर भारतीय ज्ञान और अध्यात्म चेतना का परचम फहराया था। इमर्सन, थोरो और वाल्ड व्हीटमेन के प्रयास से अमेरिका और यूरोप में भारतीय ज्ञान के प्रति सम्मान बढ़ा था और इस ज्ञान परंपरा की गहराई से स्वामी विवेकानन्द ने सभी को परिचित कराया था। स्वामीजी ने भारतीय युवाओं को विदेश यात्रा के लिए प्रोत्साहित किया और पश्चिम की विज्ञान और व्यापार की शक्ति को समझने के लिए प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद ने यूरोप और अमेरिका के स्त्री स्वाबलम्वन की अत्यधिक प्रशंसा की। स्वामी जी ने कहा कि यूरोप और अमेरिका को भीतर से बदलने के लिए वेदान्त के संदेश का अनुपालन करना चाहिए। उन्होंने पश्चिम की महानता और उनके संकट को भी बहुत करीब से देखा और उसकी तर्कपरक समीक्षा की थी। उनका स्पष्ट रूप से मानना था कि सभी देशों को एक-दूसरे से सीखना चाहिए और एक-दूसरे की मदद करके स्वावलम्बन की ओर बढ़ना चाहिए। स्वामी जी ने भारत वापस आकर भारत की कूपमंडूकता और कमियों पर गंभीरता से प्रहार किया। सिस्टर निवेदिता का कहना था कि स्वामी विवेकानन्द का निर्माण तीन चीजों से हुआ था- पारंपरिक अकादमिक ज्ञान, स्वामी रामकृष्ण का साथ और वर्षों तक भारत का परिभ्रमण। स्वामीजी ने भारत के लोगों का आत्मविश्वास और आत्मचेतना को जागृत करने का महती कार्य किया था। स्वामी विवेकानन्द का मानना था कि कोई भी ऐसी दुर्बलता नहीं है जो शिक्षा और धर्म से दूर नहीं की जा सकती है। उन्होंने शिक्षा और धर्म के केन्द्र में मनुष्य को ही रखा। उनका मानना था कि मनुष्य का निर्माण यदि धर्म नहीं करता तो वो धर्म भी मुझे स्वीकार्य नही है। उन्होंने भारतीयता और मानवीयता दोनों को की वकालत की। स्वयं महात्मा गांधी स्वामी विवेकानन्द से गहरे प्रभावित थे। स्वामी विवेकानन्द ने बनारस में ही दरिद्रनारायण की सेवा का मंत्र युवाओं को दिया था। उन्होंने सेवा धर्म के महत्त्व को स्थापित किया था। अपने व्याख्यान के बाद प्रो. प्रधान ने उपस्थित श्रोताओं की कुछ जिज्ञासाओं का समाहार भी किया। कार्यक्रम के प्रारंभ में स्नातक के विद्यार्थी रजत चौहान ने स्वामी विवेकानन्द पर एक भावपूर्ण गीत की भी प्रस्तुति की। स्वागत उद्बोधन करते हुए मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्र के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने कहा कि प्रधान सर को सुनना एक सुखद अनुभव है। स्वामी विवेकानंद पर आप को सुनना रोमांच से भर देता है। शिकागों में स्वामी जी ने अपने वक्तृतत्व से सभी श्रोताओं को चमत्कृत किया था। स्वामी जी ने सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकृति पर बल दिया था जो उनका पूरब का संदेश था पश्चिम के लिए। कार्यक्रम के अन्त में धन्यवाद उद्बोधन अन्तर सांस्कृतिक अध्ययन केन्द्र के समन्वयक प्रो. राजकुमार ने दिया। कार्यक्रम संचालन डॉ. धर्मजंग ने किया। कार्यक्रम में प्रो. अर्चना कुमार, प्रो. आर. के. मण्डल, डॉ. उषा त्रिपाठी, डॉ. राजीव वर्मा, डॉ. कृष्णकान्त, डॉ. ओमप्रकाश, डॉ. सुबोध श्रीवास्तव, डॉ.गीतांजलि सिंह समेत विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के अध्यापकगण एवं विद्यार्थी उपस्थित थे I