लखनऊ। भारतीय जनता पार्टी ने पंकज चौधरी को उत्तर प्रदेश का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाकर सियासी हलकों में नई बहस छेड़ दी है। यह फैसला औपचारिक रूप से संगठनात्मक बताया जा रहा है, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति से जोड़कर देखे जा रहे हैं।
प्रदेश अध्यक्ष का पद हमेशा से उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता और संगठन के संतुलन का अहम केंद्र रहा है। ऐसे में योगी आदित्यनाथ जैसे मजबूत मुख्यमंत्री के दौर में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह नियुक्ति सिर्फ चुनावी तैयारी है या फिर दिल्ली नेतृत्व की तरफ से योगी के बढ़ते राजनीतिक कद को संतुलित करने की कोशिश।
पंकज चौधरी केंद्र सरकार में वित्त राज्य मंत्री हैं और उन्हें अमित शाह तथा केंद्रीय नेतृत्व का भरोसेमंद माना जाता है। वे कुर्मी समुदाय से आते हैं, जो उत्तर प्रदेश की ओबीसी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। ऐसे समय में जब विपक्ष सामाजिक समीकरणों को लेकर आक्रामक है, बीजेपी का यह दांव 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि पंकज चौधरी को योगी आदित्यनाथ का करीबी नहीं माना जाता। संगठन और सरकार के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए दिल्ली नेतृत्व ने ऐसा चेहरा आगे बढ़ाया है, जो सीधे मुख्यमंत्री की परछाईं में न हो। यही वजह है कि इस नियुक्ति को योगी बनाम अमित शाह की राजनीति के चश्मे से देखा जा रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक रूप से पंकज चौधरी को बधाई दी है और किसी भी तरह के मतभेद से इनकार किया है। लेकिन पार्टी के भीतर जानकार मानते हैं कि बीजेपी अब उत्तर प्रदेश में दो स्पष्ट ध्रुव बनाकर चलना चाहती है—सरकार योगी के नेतृत्व में और संगठन दिल्ली के नियंत्रण में।
अमित शाह की राजनीति हमेशा सीधे टकराव के बजाय नियंत्रण और संतुलन पर आधारित रही है। पंकज चौधरी की नियुक्ति को भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें मुख्यमंत्री की लोकप्रियता बनी रहे, लेकिन संगठन की कमान केंद्रीय नेतृत्व के हाथ में रहे।
यह फैसला यह भी संकेत देता है कि बीजेपी उत्तर प्रदेश को किसी एक नेता पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहने देना चाहती। योगी आदित्यनाथ आज भी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं, लेकिन संगठन यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि सत्ता और संगठन अलग-अलग धुरी पर चलेंगे।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह नियुक्ति न तो योगी को कमजोर करने का खुला प्रयास है और न ही अमित शाह की सीधी दखलअंदाजी, बल्कि आने वाले चुनावों से पहले शक्ति संतुलन को दोबारा परिभाषित करने की कवायद है।
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पंकज चौधरी के नेतृत्व में पार्टी संगठन कितना स्वतंत्र रूप से काम करता है और योगी सरकार के साथ उसका तालमेल किस दिशा में जाता है। इतना तय है कि यूपी बीजेपी में यह बदलाव आने वाले समय में बड़ी सियासी कहानी की भूमिका जरूर बनेगा।