वाराणसी। काशी तमिल संगमम् देश के विभिन्न क्षेत्रों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करने और भारत की विविधता में एकता की भावना को उत्सवपूर्वक मनाने वाली राष्ट्रीय दृष्टि को परिलक्षित करता है। सदियों से काशी और तमिलनाडु के तीर्थयात्री एक-दूसरे के तीर्थों की यात्रा करते आए हैं, जिससे दोनों क्षेत्रों के बीच आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर गहरे संबंध बने। काशी तमिल संगमम् इन्हीं संबंधों की विरासत को 21वीं सदी की नई पीढ़ी तक पंहुचा रहा है। काशी तमिल संगमम् (KTS) 4.0 के पाँचवें शैक्षणिक सत्र में भी यही भावना प्रतिध्वनित हुई, जिसमें तमिलनाडु से आए शिल्पकारों और पेशेवरों के प्रतिनिधिमंडल ने बीएचयू का दौरा किया। “ काशी और कांचीपुरम के बीच संवाद- पवित्र सूत्र” थीम पर आधारित यह सत्र पं. ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में आयोजित हुआ।
मुख्य अतिथि जयंत चौधरी, राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय तथा राज्य मंत्री, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार ने अपने प्रेरक उद्बोधन में काशी तमिल संगमम् की सराहना करते हुए कहा कि यह आयोजन देश की दो प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरों को जोड़ने वाला सेतु है। उन्होंने कहा कि भले ही हम विभिन्न भाषाएँ बोलते हों और हमारे विचार भिन्न हों, परंतु हमारा मूल्य साझा है, जो हमें गहराई से जोड़ते हैं। उन्होंने कहा कि भाषा कोई बाधा नहीं, बल्कि एक सेतु है और काशी व तमिलनाडु वास्तव में एक ही परिवार हैं। उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा, “कौन बनारस आना नहीं चाहता?” बनारस में एक प्राकृतिक चुंबकीय आकर्षण है, जो लोगों को अपनी ओर खींचता है। उन्होंने बीएचयू को मात्र एक शैक्षणिक संस्था नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था बताया।
उन्होंने मार्क ट्वेन के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि “बनारस इतिहास, परंपरा और किंवदंतियों से भी अधिक पुराना है।” उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों में संवाद, संवेदनशीलता और संस्कृतिक आदान-प्रदान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। तेजी से बदलती दुनिया के संदर्भ में उन्होंने कहा कि आज परिवर्तन की गति वर्षों की नहीं रह गई है यह लगभग तत्काल हो चुकी है। इसलिए बीएचयू जैसे संस्थान देश में नवाचार, पेटेंट और यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएँगे। उन्होंने लखनऊ में बच्चों से बातचीत का अनुभव साझा करते हुए कहा कि वह यह देखकर आश्चर्यचकित थे कि अधिकांश बच्चे तीन भाषाएँ जानते थे। उन्होंने कहा, “मुझे खुशी है कि आज के बच्चे वैश्विक दृष्टिकोण रखते हैं,” उन्होंने विद्यार्थियों से अंतरराष्ट्रीय भाषाएँ सीखने का आग्रह किया। उनके उद्बोधन का तमिल अनुवाद प्रो. शिवशंकरी, कॉलेज ऑफ नर्सिंग, आईएमएस-बीएचयू द्वारा प्रस्तुत किया गया।
कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा, “सदियों से तमिलनाडु के श्रद्धालु काशी आते रहे हैं और काशी के साधक दक्षिण भारत के महान मंदिरों की यात्रा करते रहे हैं। शैव और वैष्णव परंपराएँ, मठ, पीठ, संत और विद्वान—सभी ने गंगा और कावेरी के बीच एक अदृश्य संबंध स्थापित किया है।” उन्होंने कहा कि काशी तमिल संगमम् कोई नया संबंध नहीं रचता, बल्कि एक प्राचीन बंधन को नई पीढ़ी के लिए पुनर्जीवित करता है। उन्होंने इस संस्करण में संस्कृति, रचनात्मकता और उद्यमशीलता पर विशेष जोर दिए जाने की बात कही। उन्होंने बताया कि वाराणसी के विभिन्न विद्यालयों में लगभग 50 शिक्षक तमिल भाषा का शिक्षण कर रहे हैं, जो वास्तविक शैक्षिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का उत्तम उदाहरण है। प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि काशी में देखे गए प्रत्येक वस्त्र, मूर्ति, गीत, कथा और अनुभव उनके व्यक्तिगत ज्ञान-विन्यास में नई डोर जोड़ेंगे।
प्रबंध शास्त्र संस्थान के निदेशक प्रो. आशीष बाजपेयी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि काशी की हर गली, हर घाट और हर मंदिरों के शिखर में सदियों का प्रेम, भक्ति और ज्ञान गूँजता है। आज यही प्राचीन नगर काशी और कांची के बीच आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और मानवीय संबंधों के उत्सव का साक्षी बन रहा है। उन्होंने कहा कि काशी तमिल संगमम् राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने वाले एक भारत श्रेष्ठ भारत के विचार का सशक्त प्रतीक है।
धन्यवाद ज्ञापन प्रो. जसमिंदर कौर, विभागाध्यक्ष, पेंटिंग विभाग, दृश्य कला संकाय, बीएचयू द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गान के साथ हुआ, जिसका नेतृत्व सुश्री वर्षा बसाख और सुश्री श्रेया सोनकर ने किया।