वाराणसी। तमिलनाडु से आए कलाकारों और पेशेवरों के प्रतिनिधिमंडल ने बृहस्पतिवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय में कई ज्ञानवर्धक भ्रमणों और संवाद कार्यक्रमों में प्रतिभागिता की। प्रतिनिधिमंडल ने भारत कला भवन का भ्रमण किया, जहाँ उन्होंने पं. मदन मोहन मालवीय से संबंधित अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, तथा उन्हें प्रदान किए गए भारत रत्न सम्मान को देखा। संग्रहालय में संरक्षित गुप्तकालीन स्वर्ण मुद्राएँ तथा कला दीर्घा में प्रदर्शित मुगल शैली की चित्रकृतियाँ भी अवलोकन का प्रमुख हिस्सा रहीं। मूर्तिशाला में स्थापित प्रसिद्ध नटराज कलाकृति तथा भारतीय इतिहास के विभिन्न अध्यायों से संबंधित अनेक शिल्प भी उनकी यात्रा का विशेष आकर्षण रहे।
प्रतिनिधिमंडल के पहले समूह ने अटल इन्क्यूबेशन सेंटर (AIC), बीएचयू का दौरा किया, जहाँ उन्होंने एक सारगर्भित सहभागिता सत्र में भाग लिया और संस्थान में विकसित नवाचार-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र का अवलोकन किया। प्रबंधन संस्थान के निदेशक प्रो. आशीष बाजपेयी ने काशी की पवित्र सांस्कृतिक धरोहर तथा तमिलनाडु, केरल और भारत के विभिन्न हिस्सों से आए समुदायों के बीच साझा सांस्कृतिक संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बीएचयू में इन्क्यूबेशन सेंटर की स्थापना के उद्देश्य और उसकी परिकल्पना पर विस्तार से जानकारी दी। एआईसी-बीएचयू के आचार्य प्रभारी प्रो. पी. वी. राजीव ने प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए परंपरागत व्यवसायों और स्टार्ट-अप्स के बीच के अंतर को स्पष्ट किया।
दूसरे समूह ने आयुर्वेद संकाय में “सिद्ध और आयुर्वेद का सेतु: समन्वित परंपरागत समग्र चिकित्सा दृष्टि” विषय पर आयोजित विशेष व्याख्यान में भाग लिया। कायचिकित्सा विभाग के प्रो. के. एन. मूर्ति ने अपने संबोधन में कहा कि सिद्ध चिकित्सा और आयुर्वेद, भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा की दो प्रमुख धाराएँ हैं, जिनकी मूल अवधारणाएँ और औषधीय सिद्धांत समान स्रोतों से विकसित हुए हैं। उन्होंने बताया कि ऋषि अगस्त्य की उत्तर भारत से तमिलनाडु की दिशा में हुई पौराणिक यात्रा इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों के सांस्कृतिक संबंधों का ऐतिहासिक आधार प्रस्तुत करती है। प्रो. मूर्ति ने कहा कि यही भाव ऐसे संवादों और सहयोगों को प्रोत्साहित करता है।
तीसरे समूह ने दृश्य कला संकाय में आयोजित एक विशेष सत्र में भाग लिया, जो हस्तशिल्प, सजावटी कलाओं, मूर्तिकला, काष्ठकार, वस्त्र, मिट्टी के शिल्प तथा अन्य परंपरागत कलात्मक विधाओं से जुड़े कारीगरों को समर्पित था। “कला एवं हस्तकला परंपरा: काशी और तमिलनाडु के बीच संवाद” शीर्षक इस सत्र में दोनों सांस्कृतिक रूप से समृद्ध क्षेत्रों के कलाकारों, शिल्पकारों और विद्वानों ने अपनी साझा विरासत और विशिष्ट कलात्मक अभिव्यक्तियों पर चर्चा की। संवाद में परंपरागत तकनीकों, बदलते शिल्प-प्रथाओं, तथा तेजी से आधुनिक होती दुनिया में स्वदेशी ज्ञान-परंपराओं को संरक्षित रखने की आवश्यकता पर विचार-विमर्श हुआ।
दृश्य कला एवं डिज़ाइन इतिहास के विशेषज्ञ डॉ. राजीव मंडल ने कक्षा-शिक्षण में कारीगरों को शामिल करने पर बल दिया, ताकि विद्यार्थियों को स्थानीय कला परंपराओं का वास्तविक अनुभव मिल सके और साथ ही प्रैक्टिस कर रहे कलाकार भी अकादमिक दृष्टिकोण को समझ सकें। डॉ. सुरेश सी. जांगिड़ ने प्रतिनिधिमंडल को काशी की विविध कलात्मक परंपराओं से परिचित कराया। तमिलनाडु प्रतिनिधिमंडल की ओर से बोलते हुए 40 वर्षों के अनुभव वाले स्वर्णकार श्री विश्वनाथन ने बीएचयू जैसी संस्थाओं से आग्रह किया कि पारंपरिक हस्तकला को मशीन आधारित कलाओं के साथ, समान प्रोत्साहन दिया जाए, क्योंकि परंपरागत शिल्प क्षेत्रों में रोजगार तेजी से घट रहा है।