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तमिलनाडु के लेखकों और मीडियाबंधुओं के प्रतिनिधिमंडल ने किया बीएचयू का भ्रमण



 08/Dec/25

वाराणसी काशी-तमिल संबंध एक जीवंत सत्य है, जो तीर्थयात्रा, भक्ति, साहित्य, बौद्धिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से हजारों वर्षों में सशक्त होता रहा है। काशी तमिल संगमम् न केवल इन प्राचीन संबंधों को और आगे ले जा रहा है, बल्कि आगे के संवाद को भी सुगम बना रहा है। काशी तमिल संगमम् 4.0 के तीसरे अकादमिक सत्र में रविवार को लेखकों, पत्रकारों और मीडिया पेशेवरों ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में विशेषज्ञों के साथ एक सारगर्भित चर्चा में भाग लिया एवं इस सांस्कृतिक जड़ों और सभ्यतागत निरंतरता पर विचारों का आदान प्रदान किया। सांस्कृतिक जड़ों और सभ्यतागत निरंतरता: काशीतमिल संबंधविषय पर आधारित यह सत्र संगीत एवं मंच कला संकाय के पं. ओंकारनाथ ठाकुर सभागार में आयोजित हुआ, जिसमें तमिलनाडु के लेखकों एवं मीडिया पेशेवरों का प्रतिनिधिमंडल शामिल हुआ। विमर्श में प्रतिभागिता करने वालों, अमिताभ भट्टाचार्य, प्रो. सदानंद शाही, प्रो. शिशिर बसु, प्रो. ए.गंगाधरन, डॉ. तुलसी रमन पी. और प्रतिनिधिमंडल के दो सदस्य, दिलीपन फुगल और सुश्री हरि श्वेता, शामिल थे। सत्र में सीपीआर प्रक्रिया का विस्तृत प्रस्तुतीकरण और प्रदर्शन भी किया गया।

वाराणसी के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य ने काशी और तमिलनाडु की साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह 4000वां काशी-तमिल संगमम् है। श्री भट्टाचार्य ने कहा कि दोनों संस्कृतियों के बीच सांस्कृतिक संबंध और अकादमिक आदान-प्रदान प्राचीन काल से चले आ रहे हैं और सदैव जारी रहेंगे। बनारस बहुलवाद की यात्रा है, यह कहते हुए उन्होंने बताया कि यहाँ लगभग 272 विभिन्न धार्मिक और भाषाई समुदाय रहते हैं, जो इसे वास्तविक अर्थों में एक बहुलतावादी शहर बनाते हैं। उन्होंने बताया कि अन्य स्थानों पर गंगा दक्षिण से पूर्व दिशा में बहती है, वहीं बनारस में वह उत्तर की ओर बहती है, जिसे दार्शनिक दृष्टि से आत्ममंथन के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह सहस्राब्दियों पुराना शहर है और हमेसा बना रहेगा। उन्होंने कहा कि इस शहर को समझा नहीं जा सकता, केवल महसूस किया जा सकता है। अंत में, उन्होंने सभी प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि वे वापस लौटने से पहले एक-एक बनारसी मित्र अवश्य बना लें।

हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि विश्व की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक के वक्ताओं के समक्ष खड़े होना उनके लिए अत्यंत गौरव का विषय है। उन्होंने अलवार कविताओं के हिंदी अनुवाद और भक्ति आंदोलन की उत्पत्ति पर चर्चा की। आंडाल की कथा का वर्णन करते हुए उन्होंने बताया कि पहली बार भय या लालच के बजाय शुद्ध प्रेम और भक्ति पर आधारित सम्बंध को लोकप्रिय बनाया गया। भाषाई विविधताओं के बावजूद विभिन्न संस्कृतियों में पाए जाने वाले समान दार्शनिक विचारों पर विचार करते हुए प्रो. शाही ने कहा कि किसी एक संस्कृति में जन्मे विचारों को अन्य संस्कृतियाँ अपनाती और विकसित करती हैं। काशी तमिल संगमम् 4.0 की थीम तमिल कर्कलामके विषय की महत्ता पर ज़ोर देते हुए उन्होंने अपनी मातृ भाषा से इतर एक और अन्य भारतीय भाषा सीखने के महत्व को रेखांकित किया।

प्रो. शिशिर बसु ने इस पर चिंतन किया कि इतनी विविधताओं के बावजूद भारतीयों को क्या जोड़कर रखता है। उन्होंने कहा, “यह इसलिए है क्योंकि हम सहमत ज्यादा और असहमत कम होते हैं।भारत की विविधता को इसकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बताते हुए उन्होंने कहा कि देश की विविधता ही भारत को भारत बनाती है। उन्होंने कहा कि हम इसलिए एक साथ रहे क्योंकि हम एक-दूसरे से संवाद करते रहे। प्रो. बसु ने कहा, “यदि हम संवाद नहीं कर सकते, तो हम अपनी संस्कृति को सुरक्षित नहीं रख सकते,” “संवाद ही संस्कृति है और संस्कृति ही संवाद है।उन्होंने स्पष्ट किया कि हम लोग आम बोलचाल में मीडिया को संवाद मान लेते हैं, जबकि मीडिया केवल संवाद का एक माध्यम है। प्रो. बसु ने सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए अधिक नवोन्मेषी संवाद माध्यमों की खोज की आवश्यकता की बात दोहराई।

इतिहास विभाग के प्रो. ए. गंगाधरन ने बताया कि तमिल एकमात्र भाषा है जिसकी शुरुआत ही एक विद्वत परंपरा, ‘संगमसे हुई है। उन्होंने कहा कि इतिहास में कई संगम हुए, जिनमें 1920 के दशक में मदुरै में हुआ संगम भी शामिल है। महाकवि भारती पर बोलते हुए उन्होंने बताया कि एक भारत, श्रेष्ठ भारतकी परिकल्पना का सूत्रपात भरतियार ने ही किया था, जिन्होंने काशी और तमिलनाडु दोनों के विकास की कल्पना की थी। उन्होंने यह भी बताया कि आज तमिलनाडु में 484 काशी विश्वनाथ मंदिरहैं, जो इस बात का प्रमाण है कि काशी विश्वनाथ तमिल संस्कृति में कितनी गहराई से समाहित हैं। उन्होंने कहा कि आज तमिलनाडु की समृद्धि उसकी अपनी संस्कृति को सहेजकर रखने की प्रतिबद्धता में निहित है।

प्रो. संजय कुमार ने अपने स्वागत भाषण में काशी और तमिल संस्कृतियों को एक ही सभ्यता के दो स्तंभ बताया। नयनार और अलवार जैसे प्राचीन तमिल कवियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि किस प्रकार उनके दार्शनिक विचार पूरे उपमहाद्वीप में, काशी तक भी प्रसारित हुए और यह विरासत आधुनिक युग में महाकवि सुब्रमण्यम भारती और डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे व्यक्तित्वों के साथ आगे बढ़ी। प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा, “जो भाव तीर्थयात्री अपने हृदय में लेकर चलते थे, वही भाव आज के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य अपने शब्दों में लेकर चले हैं।

सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर सुश्री हरिश्वेता ने कहा कि प्रौद्योगिकी के माध्यम से काशी की संस्कृति को पुनः खोजा जा रहा है। उन्होंने बताया कि तकनीक कैसे भक्ति और अध्यात्म को बढ़ावा दे रही है, और किस प्रकार केरल के युवा समूह डिजिटल मंचों पर भजन प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी आज अनेक जेन-ज़ी युवाओं को आध्यात्मिकता का मार्गदर्शन दे रही है।

दिनाकरण समूह के दिलिपन फुगल ने तमिल की पारंपरिक लोक कलाओं में निहित रामायण और महाभारत की कथाओं का उल्लेख किया। उन्होंने नमो घाट पर प्रस्तुत खुम्मी कोलट्टम नृत्य में दोनों महाकाव्यों के श्लोक शामिल किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने काशी को एक विशाल वृक्ष के रूप में वर्णित किया जिसकी शाखाएँ पूरे देश में फैली हुई हैं, और वाराणसी के कई घाटों व स्थलों से तमिलनाडु के संबंधों का उल्लेख किया। डॉ. तुलसिरामन ने कहा कि लेखक और लेखन के बीच का संबंध संगम साहित्य के समय से ही मौजूद रहा है। इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण मणिमेकलै ग्रंथ है, जिसमें काशी की यात्रा का वर्णन मिलता है। काशी के वातावरण ने भरतियार के जीवन में अनेक परिवर्तन लाए और भविष्य में उनकी अनेक रचनाओं की प्रेरणा का मार्ग प्रशस्त किया। सत्र का संयोजन अंग्रेजी विभाग के प्रो. बनिव्रत महंता तथा आईआईटीबीएचयू के कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. के. लक्ष्मणन ने किया। तमिल प्रतिनिधिमंडल के लेखक सदस्यों ने अपनी 14 पुस्तकें मंच पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों को भेंट कीं, जो काशी हिंदू विश्वविद्यालय को प्रदान की जा रही हैं। कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग से डॉ. विवेक सिंह, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग से डॉ. नेहा पांडेय, तथा आईआईटीबीएचयू के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग से डॉ. शेरोन मानो ने किया। धन्यवाद ज्ञापन पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के प्रो. अनुराग दवे द्वारा किया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. शिवशक्ति प्रसाद द्विवेदी, प्रांतीय चिकित्सा अधिकारी, वाराणसी, द्वारा सीपीआर पर प्रस्तुति से हुई। उन्होंने हृदयगति रुकने की अवधारणा और तीन मिनट के स्वर्णिम कालकी जानकारी दी तथा पुतले की सहायता से सीपीआर का प्रदर्शन किया। डॉ. तुलसिरामन पी. ने तमिल भाषी सदस्यों के लिए उनके विवरण का तमिल में अनुवाद किया।

तमिल प्रतिनिधिमंडल ने महामना अभिलेखागार का भी दौरा किया, जहाँ उन्होंने अभिलेखागार की प्रदर्शनी देखी। कई प्रदर्शित तस्वीरों ने उनका ध्यान आकर्षित किया। महामना आर्काइव्स के संयोजक प्रो. ध्रुव कुमार सिंह ने तस्वीरों और पत्रों से संबंधित उनके प्रश्नों का उत्तर दिया। तमिलनाडु से संबंधित एक विशेष पैनल ने भी प्रतिनिधियों का ध्यान खींचा। प्रतिनिधिमंडल डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के हस्तलिखित पत्रों की प्रतियों को देखकर विशेष रूप से प्रभावित हुआ। इस दौरान प्रो. संजय कुमार, समन्वयक, मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र, डॉ. नवीन जैन, सहायक अभिलेखीय अधिकारी तथा अभिलेखागार के शोध छात्र भी उपस्थित रहे।


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