कार्यक्रम की शुरुआत भारतेंदु जी के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुई। इसके उपरांत धर्मेंद्र गुप्त 'साहिल' की दो ग़ज़ल पुस्तकों ‘जिसे मैं कह नहीं पाया’ और ‘इन दिनों’ का भी विमोचन किया गया।
मुख्य वक्ता और नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने भारतेंदु को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि, “भारतेंदु बाबू व्यक्ति नहीं, संस्था थे। केवल 35 वर्षों के जीवन में उन्होंने जो साहित्य, भाषा और समाज के लिए किया, वह हिंदी समाज के लिए अमूल्य धरोहर है। वे संस्कृति के मोर्चे पर स्वतंत्रता संग्राम लड़ने वाले योद्धा थे।”
मुख्य अतिथि मंत्री डॉ० दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ने कहा, “यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं उस संस्था में शामिल हूँ, जहां भारतेंदु ने साहित्य की अलख जगाई। मैं स्वयं इस संस्था से तीस वर्षों तक अध्ययन-अध्यापन से जुड़ा रहा हूँ। काशी के हम सभी लोग उस ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं।”
कार्यक्रम में एक विचार गोष्ठी एवं कविता पाठ का भी आयोजन हुआ, जिसमें सुधीर त्रिपाठी, गौरव राठी, संतोष सैनी, अरुण पांडेय, सौरभ राय, सिद्धनाथ शर्मा, विजयचंद्र त्रिपाठी, रामानंद दीक्षित, दिनेशदत्त पाठक, विंध्याचल पांडेय, संतोष प्रीत, धर्मेंद्र गुप्त 'साहिल', हिमांशु तिवारी और व्योमेश शुक्ल ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को अभिभूत किया।
कार्यक्रम का संयोजन प्रतीक शर्मा ने किया और अतिथियों का स्वागत दीपेश चौधरी व मालिनी चौधरी ने किया।
">हिंदी नवजागरण के पुरोधा भारतेंदु हरिश्चंद्र की 176वीं जयंती के अवसर पर ठठेरी बाजार स्थित उनके आवास में एक गरिमामय साहित्यिक आयोजन हुआ। इस मौके पर नागरीप्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'ख़ुसरो की हिंदी कविता' का लोकार्पण प्रदेश के आयुष, खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ० दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ और भारतेंदु के वंशज दीपेश चौधरी द्वारा संयुक्त रूप से किया गया। पुस्तक का संपादन भारतेंदु के दौहित्र और वरिष्ठ साहित्यकार ब्रजरत्नदास ने किया है।
कार्यक्रम की शुरुआत भारतेंदु जी के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुई। इसके उपरांत धर्मेंद्र गुप्त 'साहिल' की दो ग़ज़ल पुस्तकों ‘जिसे मैं कह नहीं पाया’ और ‘इन दिनों’ का भी विमोचन किया गया।
मुख्य वक्ता और नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने भारतेंदु को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि, “भारतेंदु बाबू व्यक्ति नहीं, संस्था थे। केवल 35 वर्षों के जीवन में उन्होंने जो साहित्य, भाषा और समाज के लिए किया, वह हिंदी समाज के लिए अमूल्य धरोहर है। वे संस्कृति के मोर्चे पर स्वतंत्रता संग्राम लड़ने वाले योद्धा थे।”
मुख्य अतिथि मंत्री डॉ० दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ने कहा, “यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं उस संस्था में शामिल हूँ, जहां भारतेंदु ने साहित्य की अलख जगाई। मैं स्वयं इस संस्था से तीस वर्षों तक अध्ययन-अध्यापन से जुड़ा रहा हूँ। काशी के हम सभी लोग उस ज्ञान परंपरा के उत्तराधिकारी हैं।”
कार्यक्रम में एक विचार गोष्ठी एवं कविता पाठ का भी आयोजन हुआ, जिसमें सुधीर त्रिपाठी, गौरव राठी, संतोष सैनी, अरुण पांडेय, सौरभ राय, सिद्धनाथ शर्मा, विजयचंद्र त्रिपाठी, रामानंद दीक्षित, दिनेशदत्त पाठक, विंध्याचल पांडेय, संतोष प्रीत, धर्मेंद्र गुप्त 'साहिल', हिमांशु तिवारी और व्योमेश शुक्ल ने अपनी कविताओं से श्रोताओं को अभिभूत किया।
कार्यक्रम का संयोजन प्रतीक शर्मा ने किया और अतिथियों का स्वागत दीपेश चौधरी व मालिनी चौधरी ने किया।