नई दिल्ली। भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन का पहला दिन वैश्विक कूटनीति के लिहाज से बेहद अहम रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई मुलाकातों ने दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा। एक तरफ रूस के साथ भारत की पुरानी रणनीतिक साझेदारी की तस्वीर दिखाई दी, तो दूसरी तरफ गलवान के बाद भारत-चीन संबंधों में आई तल्खी के बीच मोदी-जिनपिंग संवाद ने रिश्तों में नई संभावनाओं के संकेत दिए।
BRICS के मंच से भारत ने एक साथ कई बड़े संदेश देने की कोशिश की है। नई दिल्ली रूस के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को बनाए रखना चाहती है, चीन के साथ तनाव कम करने के लिए संवाद बढ़ाना चाहती है और साथ ही अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत रखना चाहती है।
यानी भारत की नीति साफ दिखाई देती है—किसी एक शक्ति खेमे का हिस्सा बनने के बजाय अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के साथ बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत करना।
## मोदी-जिनपिंग मुलाकात ने खींचा सबसे ज्यादा ध्यान
BRICS सम्मेलन के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में रही। 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के रिश्तों में लंबे समय तक तनाव रहा। ऐसे में जिनपिंग की भारत यात्रा और मोदी के साथ उनकी बातचीत को दोनों देशों के रिश्तों में अहम पड़ाव माना जा रहा है।
दोनों नेताओं के बीच सीमा पर शांति और स्थिरता, व्यापार, आर्थिक सहयोग तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने जैसे मुद्दों पर बातचीत हुई।
हालांकि इस मुलाकात को भारत-चीन संबंधों में पूरी तरह नई शुरुआत कहना अभी जल्दबाजी होगी। सीमा विवाद अब भी दोनों देशों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दा है। इसके अलावा चीन के साथ भारत का व्यापार लगातार बढ़ रहा है, लेकिन व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है।
इसलिए मोदी-जिनपिंग मुलाकात को दोस्ती की पूर्ण वापसी के बजाय दोनों देशों के बीच तनाव को नियंत्रित करने और संवाद का रास्ता मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।
## पुतिन के साथ मोदी की बातचीत भी रही अहम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच भी महत्वपूर्ण बातचीत हुई। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की।
भारत और रूस के संबंध दशकों पुराने हैं। रक्षा के अलावा ऊर्जा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, व्यापार और तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों के रिश्ते महत्वपूर्ण हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों और रूस के बीच तनाव बढ़ने के बावजूद भारत ने मॉस्को के साथ अपने संबंधों को खत्म नहीं किया। नई दिल्ली लगातार यह स्पष्ट करती रही है कि भारत की विदेश नीति किसी तीसरे देश के दबाव के आधार पर तय नहीं होगी।
BRICS सम्मेलन में मोदी-पुतिन की मुलाकात ने इसी नीति को एक बार फिर सामने रखा।
भारत का संदेश साफ है—रूस के साथ रणनीतिक साझेदारी जारी रहेगी, लेकिन भारत की विदेश नीति केवल रूस तक सीमित नहीं है।
## BRICS को अमेरिका विरोधी मंच बनाने से दूरी
BRICS के भविष्य को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह संगठन धीरे-धीरे अमेरिका और पश्चिम के खिलाफ एक राजनीतिक-आर्थिक गुट बन जाएगा।
भारत का रुख इस मामले में अलग दिखाई देता है। नई दिल्ली BRICS को किसी देश के खिलाफ बने गठबंधन के रूप में नहीं देखना चाहती। भारत चाहता है कि BRICS Global South की आवाज को मजबूत करने वाला मंच बने।
भारत के लिए BRICS का महत्व तभी बढ़ेगा जब यह संगठन केवल राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित न रहकर व्यापार, निवेश, ऊर्जा, तकनीक, सप्लाई चेन और विकास के क्षेत्रों में ठोस सहयोग पैदा करे।
यही वजह है कि भारत BRICS के एजेंडे में व्यावहारिक आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता दे रहा है।
## रूस, चीन और अमेरिका के बीच भारत की संतुलन नीति
BRICS सम्मेलन की तस्वीर को व्यापक नजरिए से देखें तो भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।
भारत एक साथ कई बड़ी शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है।
रूस के साथ भारत के रक्षा और ऊर्जा संबंध हैं। चीन के साथ व्यापार और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा दोनों हैं। अमेरिका के साथ रक्षा, तकनीक, निवेश और इंडो-पैसिफिक सहयोग के रिश्ते लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।
ऐसे में भारत किसी एक खेमे में जाने के बजाय Strategic Autonomy की नीति पर आगे बढ़ रहा है।
नई दिल्ली का संदेश है कि भारत अपनी विदेश नीति दूसरे देशों के दबाव में नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करेगा।
## डॉलर पर BRICS की बहस और भारत का रुख
BRICS के विस्तार के साथ स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की चर्चा भी तेज हुई है। रूस समेत कई सदस्य देश वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की भूमिका को कम करने के पक्ष में हैं।
भारत हालांकि इस मामले में व्यावहारिक दृष्टिकोण रखता है।
नई दिल्ली अचानक डॉलर आधारित वैश्विक व्यापार व्यवस्था से बाहर निकलने के बजाय भुगतान के अधिक विकल्प और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की संभावनाओं को बढ़ाना चाहती है।
भारत के लिए इसका उद्देश्य किसी एक मुद्रा को हटाना नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार को अधिक विविध और लचीला बनाना है।
## आतंकवाद के मुद्दे पर भी भारत की नजर
भारत के लिए BRICS का मंच आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन मजबूत करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
नई दिल्ली लगातार यह प्रयास करती रही है कि आतंकवाद को किसी एक देश या क्षेत्र की समस्या के बजाय पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए चुनौती के रूप में देखा जाए।
BRICS के मंच पर आतंकवाद के खिलाफ सहयोग की चर्चा भारत के लिए महत्वपूर्ण कूटनीतिक मुद्दा है। इससे भारत को यह संदेश देने का अवसर मिलता है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर किसी भी प्रकार का दोहरा रवैया स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
## BRICS का विस्तार: ताकत भी और चुनौती भी
BRICS के विस्तार के साथ संगठन की आर्थिक और राजनीतिक ताकत बढ़ी है। दुनिया की बड़ी आबादी, ऊर्जा संसाधनों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व अब इस समूह में दिखाई देता है।
लेकिन विस्तार के साथ चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
BRICS के सदस्य देशों के हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद है। रूस और पश्चिम के बीच गहरा टकराव है। पश्चिम एशिया के देशों के भी अपने अलग रणनीतिक हित हैं।
इसलिए BRICS को NATO जैसे सैन्य गठबंधन के रूप में देखना सही नहीं होगा।
इसकी वास्तविक ताकत इस बात में है कि अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक हितों वाले देशों को एक मंच पर लाकर आर्थिक तथा कूटनीतिक सहयोग बढ़ाया जाए।
## पश्चिम एशिया संकट पर भी BRICS की भूमिका अहम
पश्चिम एशिया में बदलती परिस्थितियों और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौतियों के बीच BRICS की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल विदेश नीति का विषय नहीं है। तेल और गैस की आपूर्ति, समुद्री व्यापार, भारतीय प्रवासी और वैश्विक सप्लाई चेन सीधे तौर पर इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
इसलिए नई दिल्ली BRICS के माध्यम से संघर्षों के शांतिपूर्ण समाधान और क्षेत्रीय स्थिरता की दिशा में अंतरराष्ट्रीय सहमति मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
## दिल्ली से दुनिया को मिला सबसे बड़ा संदेश
BRICS सम्मेलन के पहले दिन की तमाम गतिविधियों को एक साथ रखें तो भारत की रणनीति काफी स्पष्ट दिखाई देती है।
पहला संदेश यह है कि भारत रूस के साथ अपने पारंपरिक रणनीतिक संबंधों को कमजोर नहीं करेगा।
दूसरा, भारत और चीन के बीच तनाव कम करने के लिए संवाद का रास्ता खुला रहेगा।
तीसरा, भारत BRICS को केवल अमेरिका विरोधी संगठन बनाने के पक्ष में नहीं है।
चौथा, भारत Global South की आवाज को वैश्विक संस्थाओं में ज्यादा मजबूत करना चाहता है।
और पांचवां, भारत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रखना चाहता है।
## अब आगे क्या?
BRICS सम्मेलन के पहले दिन ने उम्मीदें जरूर बढ़ाई हैं, लेकिन असली परीक्षा सम्मेलन के बाद होगी।
क्या भारत-चीन के बीच बढ़ता संवाद सीमा पर स्थायी शांति में बदल पाएगा?
क्या दोनों देशों के बीच व्यापार में मौजूद असंतुलन कम होगा?
क्या रूस के साथ भारत के आर्थिक संबंध रक्षा और ऊर्जा से आगे बढ़ेंगे?
और सबसे अहम सवाल—क्या BRICS वैश्विक राजनीति में एक प्रभावशाली आर्थिक और कूटनीतिक मंच बन पाएगा या फिर यह केवल घोषणाओं तक सीमित रहेगा?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे।
फिलहाल नई दिल्ली ने दुनिया को इतना जरूर बता दिया है कि भारत बदलती वैश्विक व्यवस्था में किसी एक शक्ति के पीछे चलने के बजाय खुद एक स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में अपनी जगह मजबूत करने की तैयारी में है।
BRICS का पहला दिन खत्म हो चुका है, लेकिन दिल्ली से शुरू हुई यह कूटनीतिक कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।