डॉ. स्वप्निल पाठक ने बताया कि स्वाइन फ्लू इन्फ्लूएंजा-ए वायरस के H1N1 स्ट्रेन से होने वाला तीव्र श्वसन संक्रमण है। यह मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या सांस लेने के दौरान निकलने वाली सूक्ष्म बूंदों के माध्यम से फैल सकता है। शुरुआती लक्षण सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कई मामलों में इनकी तीव्रता अधिक हो सकती है।
उन्होंने बताया कि इसके प्रमुख लक्षणों में अचानक तेज बुखार और कंपकंपी, लगातार सूखी खांसी, गले में खराश या दर्द, सांस लेने में परेशानी अथवा छाती में भारीपन, शरीर एवं मांसपेशियों में दर्द, सिरदर्द, अत्यधिक थकान और कमजोरी शामिल हैं। कुछ मरीजों में उल्टी, दस्त या भूख कम लगने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।
डॉ. पाठक ने कहा कि बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं तथा अस्थमा, सीओपीडी, डायबिटीज, हृदय रोग या कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। ऐसे लोगों में फ्लू से संबंधित जटिलताओं का जोखिम अधिक हो सकता है।
उन्होंने लोगों को संक्रमण से बचाव के लिए नियमित रूप से साबुन और पानी से कम से कम 20 सेकंड तक हाथ धोने या अल्कोहल-युक्त हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने की सलाह दी। भीड़भाड़ वाली जगहों और अस्पतालों में जाते समय मास्क का उपयोग करने, खांसते या छींकते समय मुंह-नाक को टिशू या रुमाल से ढकने तथा सर्दी-खांसी या बुखार से पीड़ित व्यक्ति से उचित दूरी बनाए रखने को कहा।
उन्होंने पर्याप्त मात्रा में पानी पीने और पौष्टिक आहार लेने की सलाह दी। जोखिम वाले वर्ग के लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार वार्षिक फ्लू वैक्सीन लगवाने पर भी विचार करना चाहिए।
डॉ. स्वप्निल पाठक ने कहा कि अक्सर लोग बुखार या खांसी होने पर बिना चिकित्सकीय सलाह के मेडिकल स्टोर से एंटीबायोटिक्स या अन्य दवाएं लेना शुरू कर देते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वाइन फ्लू एक वायरल संक्रमण है, इसलिए एंटीबायोटिक्स वायरस के खिलाफ काम नहीं करती हैं। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक की सलाह से एंटीवायरल दवाएं दी जा सकती हैं।
उन्होंने कहा कि यदि सांस लेने में कठिनाई हो, लक्षण गंभीर हों या बुखार तीन दिनों से अधिक बना रहे, तो बिना देरी किए नजदीकी चिकित्सक या विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय पर जांच और उपचार से बीमारी को गंभीर होने से रोका जा सकता है।