सरकारी दस्तावेजों से गुलामी को हटाए प्रशासन
वाराणसी। शहर के व्यापारियों और उद्यमियों ने सरकारी राजस्व अभिलेखों से "केसर-ए-हिंद (Emperor of British India)" जैसे औपनिवेशिक शब्दों को हटाने की मांग की है। व्यापारियों का कहना है यह केवल एक प्रशासनिक सुधार का विषय नहीं है, बल्कि यह देश की ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक अस्मिता और स्वतंत्र भारत की गरिमा से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न भी है।
मंगलवार को पराड़कर भवन में मालवीय मार्केट व्यावसायिक संघ की ओर से आयोजित "परिचर्चा" में व्यापारियों ने कहा
कोतवाली थाना जिस आराजी संख्या पर दर्ज हैं, उसके राजस्व रिकॉर्ड में आज भी ब्रिटिश शासनकाल का "केसर-ए-हिंद, एम्परर ऑफ ब्रिटिश इंडिया" शब्द अंकित है। स्वतंत्रता प्राप्ति के दशकों बाद भी ऐसे औपनिवेशिक उल्लेखों का बने रहना प्रशासनिक अभिलेखों के समयानुकूल अद्यतन न होने की ओर संकेत करता है।
मालवीय मार्केट व्यावसायिक संघ के अध्यक्ष अभिषेक केसरी ने कहा कि पिछले दिनों पूर्व मंत्री शतरुद्र प्रकाश ने मुद्दा उठाया था और प्रशासन को पत्र भेजकर सुधार की मांग की थी। लेकिन अभी तक प्रशासनिक स्तर पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी है। उन्होंने कहा कि यह शब्द ब्रिटिश साम्राज्य और औपनिवेशिक शासन की याद दिलाता है, इसलिए इसे राजस्व रिकॉर्ड से हटाकर वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप संशोधित किया जाना चाहिए।
बनारस बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष धीरेंद्र नाथ शर्मा ने
कहा कि वाराणसी की कोतवाली केवल एक थाना नहीं, बल्कि काशी की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। जनमान्यता के अनुसार काशी के कोतवाल भगवान काल भैरव हैं और कोतवाली परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित है, जिसकी नियमित पूजा-अर्चना भी होती है। ऐसे महत्वपूर्ण स्थल से जुड़े सरकारी अभिलेखों में औपनिवेशिक शब्दों का बने रहना कई लोगों को असंगत प्रतीत होता है। श्री शर्मा ने कहा कि किसी भी सरकारी रिकॉर्ड में संशोधन विधिक प्रक्रिया और प्रामाणिक अभिलेखों के आधार पर ही किया जाता है। यदि संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में वास्तव में ऐसे शब्द दर्ज हैं, तो प्रशासन को उनकी वैधानिक समीक्षा कर आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए। काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरुण मिश्र ने कहा कि आजादी केवल राजनीतिक परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था, अभिलेखों और सार्वजनिक संस्थानों में भी स्वतंत्र भारत की पहचान को स्थापित करने की सतत प्रक्रिया है। ऐसे में यदि कहीं औपनिवेशिक काल के अप्रासंगिक प्रतीक अब भी सरकारी दस्तावेजों में मौजूद हैं, तो उनका विधिसम्मत पुनरीक्षण समय की मांग माना जा सकता है। परिचर्चा में कई व्यापारी प्रतिनिधि मौजूद रहे।