MENU

गुरु पूर्णिमा महोत्सव पर गड़वाघाट आश्रम में उमड़ा शिष्यों का रेला, लाखों शिष्यों ने लिया सतगुरु सरनानन्द जी का आशीर्वाद



 30/Jul/26

“गुरु का सानिध्य मानवता के संस्कार विकसित करता है।” — सतगुरु सरनानन्द

वाराणसी। संतमत अनुयायी आश्रम, मठ गड़वाघाट में गुरु पूर्णिमा महोत्सव के अवसर पर श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुपम दृश्य देखने को मिला। प्रातःकाल से लेकर देर रात तक आश्रम परिसर में भक्तों, संतों और शिष्यों का निरंतर आगमन होता रहा। विशाल क्षेत्र में फैले आश्रम में उमड़ी आस्था की भीड़ ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक चेतना से सराबोर कर दिया।

आदिकाल से चली आ रही चिर परंपरा “गुरु-दीक्षा” को जीवित रखते हुए भटके हुए लोगों को सही मार्ग दिखाने का संकल्प संतमत अनुयायी आश्रम, मठ गड़वाघाट के वर्तमान पीठाधीश्वर श्री श्री 108 स्वामी सरनानन्द जी महाराज ने अपने बहुमूल्य जीवन का धर्म बना लिया है। काशी नगरी के दक्षिणी क्षेत्र में माँ भागीरथी के पावन तट पर स्थित संतों की तपस्थली गड़वाघाट में उषाकाल से ही श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा। भक्तों, संतों और शिष्यों का यह सिलसिला पूरे दिन और देर रात तक निरंतर चलता रहा, मानो “चरैवेति-चरैवेति” की परंपरा सजीव हो उठी हो।

गुरु महोत्सव का शुभारंभ आश्रम के पूर्व पीठाधीश्वरों श्री श्री 1008 स्वामी आत्मविवेकानन्द जी परमहंस से लेकर श्री श्री 1008 स्वामी हरशंकरानन्द जी परमहंस तक सभी पूज्य संतों की समाधियों पर विधिवत पूजन-अर्चन और आरती के साथ हुआ। वर्तमान पीठाधीश्वर ने अपने करकमलों से गुरु परंपरा के अनुसार सभी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए। इसके उपरांत उन्हें सुसज्जित आसन पर विराजमान कराया गया, जहां संतों, भक्तों और शिष्यों ने उनका पूजन, आरती और अभिनंदन किया। यह आध्यात्मिक क्रम देर रात तक अबाध गति से चलता रहा।

सायंकाल आश्रम के विशाल सत्संग भवन में आयोजित श्री सद्गुरुदेव जी की विराट एवं भव्य महाआरती श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रही। दीपों की अलौकिक छटा, मंत्रोच्चार और भक्ति से भरे वातावरण ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। अनेक श्रद्धालु इस दिव्य आरती के दर्शन कर स्वयं को धन्य मानते दिखाई दिए।

उक्त अवसर पर उमड़े भक्तों के विशाल समूह को संबोधित करते हुए श्री श्री 108 स्वामी सद्गुरु सरनानन्द जी महाराज परमहंस ने कहा कि मानव जीवन की श्रेष्ठता उसके कर्मों से सिद्ध होती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि अपने कर्मों को श्रेष्ठ रखें, क्योंकि श्रेष्ठ कर्म ही श्रेष्ठ प्रारब्ध का निर्माण करते हैं। उन्होंने कहा कि सेवा और समर्पण ही शिष्य के लिए सच्ची गुरुदक्षिणा है।

सतगुरु सरनानन्द जी ने अपने संदेश में कहा कि गुरु का सानिध्य व्यक्ति के भीतर सदाचार, सेवा-भाव, प्रेम, अनुशासन और मानवता के संस्कार विकसित करता है। गुरु केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले चेतना-पुरुष होते हैं। उन्होंने शिष्यों से समाज में प्रेम, करुणा और सेवा की भावना को प्रसारित करने का आह्वान किया।

दिनभर चले इस विराट गुरु पूर्णिमा महोत्सव में बाबा प्रकाशध्यानानन्द, धर्मदर्शनानन्द, सतज्ञानानन्द, दिव्यदर्शनानन्द सहित विभिन्न आश्रमों से पधारे अनेक संत-महात्मा उपस्थित रहे। कलकत्ता, मुंबई, हरिद्वार और अन्य स्थानों से आए श्रद्धालुओं तथा स्थानीय भक्तों का समुदाय बड़ी श्रद्धा और तत्परता के साथ गुरु-सेवा में लीन दिखाई दिया।

गुरु पूर्णिमा महोत्सव के दौरान आश्रम परिसर में भक्ति, सेवा, अनुशासन और समर्पण का अद्भुत संगम देखने को मिला। देर रात तक श्रद्धालुओं का आगमन जारी रहा और गड़वाघाट आश्रम एक विशाल आध्यात्मिक परिवार के रूप में दिखाई देता रहा, जहां गुरु और शिष्य के पवित्र संबंध की सनातन परंपरा पूर्ण गरिमा के साथ जीवंत होती रही।


इस खबर को शेयर करें

Leave a Comment

9694


सबरंग